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हादसों के बाद भी नहीं चेता बिजली विभाग

Kushinagar Updated Fri, 12 Oct 2012 12:00 PM IST
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पिपरा बाजार। रामपुर कोटवा विद्युत उपकेंद्र का बंदोबस्त भगवान भरोसे ही चल रहा है। केंद्र के दायरे में आने वाले करीब 350 गांवों के तारों की गड़बड़ी दुरुस्त करने के लिए विभाग के पास एक भी प्रशिक्षित लाइनमैन नहीं है। जर्जर खंभे व कामचलाऊ तारों से कई हादसे हो चुके हैं, लेकिन इसके बाद भी विभाग चेतने को तैयार नहीं लग रहा है।
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रामपुर कोटवा विद्युत उपकेंद्र 1974 में वजूद में आया। पूरब दिशा में एकवनही 20 किलोमीटर, पश्चिम बेलवा घाटा 15 किलोमीटर, उत्तर मठिया 18 किलोमीटर तथा दक्षिण दांदोपुर 21 किलोमीटर के अंतर्गत 350 गांव इस केंद्र से ही आपूर्ति पाते हैं। विद्युतीकरण के बाद आपूर्ति शुरू हुई, लेकिन शुरुआती दौर में लगे लकड़ी के पोल तथा तार समय बीतने के साथ खराब होने लगे। विभागीय लोग भी मानते हैं कि देखभाल रहती तो तार 35 वर्ष तक काम लायक रहते। 38 साल पहले लगाए गए लकड़ी के पोल आज भी दांदोपुर, भोजवली, बसडीला, परगन मठिया, राजमन छपरा, पिपरा बुजुर्ग, चितहा, धर्मपुर, गुलरिहा, मठिया प्रसिद्ध तिवारी आदि गांवों में विभागीय बदहाली की कहानी कहते हैं। चितहा में टूटे पोल, पतले बांस का सहारा लेकर खड़े हैं। तो बसडीला में वर्षों पूर्व जले कुछ खंभे आज तक विभाग की नजर ए इनायत के तलबगार हैं। अलबत्ता गांव वाले बांस को ही विकल्प के तौर पर इस्तेमाल कर बिजली की सप्लाई ले रहे हैं।
उपकेंद्र के गांव नौगांवा, बिजयी छपरा, धर्मपुर, सिसवा गोईती के लोगों ने कई बार विभागीय अधिकारियों का दरवाजा खटखटाया है। गांव के शिवकुमार कुशवाहा 2008 में गांव की ही बेईली की करंट से हुई मौत के बाद ढीले तारों को कसवाने के लिए दौड़ लगा रहे हैं। पूर्व के विद्युतीकरण में खंभों की दूरी 80-100 मीटर रखी गई थी, इसलिए तार ढीले होकर लटकने लगते हैं। करंट से क्षेत्र के बिट्टू यादव, टेढ़ी के दिलशेर जान गंवा चुके हैं। चितहा के दुर्गेश मिश्र, पिपरा खुर्द के दिग्विजय, विजयी छपरा के रामदौड़, बैजनाथ कुशवाहा व समतोला, दरगौली के कृपाल को भी करंट लग चुका है। जबकि तारों के टूटने से कई पशु भी जान गंवा चुके हैं। फसलों का भी नुकसान हुआ है। फाल्ट ठीक करने के प्रयास में बीते वर्षों में मोहन व बलिस्टर की जान जा चुकी है और राकेश चौहान घायल हो चुके हैं। विभागीय जानकारी के अनुसार उपकेंद्र पर एक जेई, तीन लाइनमैन, चार टेक्निशियन एवं पांच पैट्रोल मैन होने चाहिए, जबकि इस समय सिर्फ एक जेई व एक श्रमिक की तैनाती है। आपूर्ति जारी रखने के लिए 8 प्राइवेट लाइनमैन व फ्रेंचाइजी के तीन एसएसओ को लगाया गया है। लेकिन प्राइवेट लाइनमैन सिकंदर, राकेश, सुभाष, विजय व संजय कहते हैं कि तीन साल पहले उन्हें हर माह जेई एक-डेढ़ हजार रुपये देते थे, किंतु अब पैसा नहीं मिल रहा है। जान जोखिम में डालने वाले इन लोगों का सहारा बख्शीश ही रह गया है। चितहा के उमेश मिश्र, धर्मपुर के शैलेश तिवारी, नौगांवां के लालबाबू, गुलरिहा के राजेश तिवारी, सुखारी छपरा के रामप्रताप कुशवाहा कहते हैं कि जब भी तेज हवा चलती है तो लगता है कि अंधेरे में रहना पड़ेगा। इस संबंध में केंद्र पर मौजूद फ्रेंचाइजी के एसएसओ आलोक पांडेय का कहना रहा कि व्यवस्था दुरुस्त रखने की कोशिश की जाती है। लेकिन कर्मचारियों की कमी से दिक्कतें पेश आती रहती हैं।
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