न तो अध्यापक हैं न ही सुविधाएं

Kushinagar Updated Fri, 05 Oct 2012 12:00 PM IST
पडरौना। शिक्षा के अधिकार कानून को लागू तो कर दिया गया है लेकिन जरूरी संसाधन ही सरकारी प्राथमिक और जूनियर विद्यालयों में नहीं है। इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिये गये लेकिन सरकारी अदूरदर्शिता की वजह से अधिकतर विद्यालयों पर एक से दो अध्यापक ही मौजूद हैं। गुरुवार को अमर उजाला ने पडरौना नगर क्षेत्र तथा आसपास के कुछ प्राथमिक और जूनियर विद्यालयों में पठन-पाठन का हाल जाना। पेश है संवाददाता धीरेंद्र बिक्रमादित्य गोपाल के साथ फोटोग्राफर संतोष वर्मा तथा मंशाछापर से नवीन पांडेय और रामकोला से सुरेंद्र कुमार सिंह की आंखों देखी।
समय: सुबह 10.30
स्थान: प्राथमिक विद्यालय, बुढिया माई मंदिर के पास
विद्यालय में एक से पांच तक नामांकित बच्चों की संख्या 111 बतायी गयी। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ जुदा थी। 50 से कुछ अधिक बच्चे ही मौजूद थे। सहायक अध्यापिका विजय लक्ष्मी शर्मा एक कमरे में चार और पांच के बच्चों को पढ़ा रही थीं। अन्य कक्षाएं खाली थीं, बच्चे शोर करने और बातचीत करने में व्यस्त थे। प्रधानाध्यापक के रूप में तैनात सतीश श्रीवास्तव के बारे में पता चला कि वे किसी प्रशिक्षण में गये हैं। सहायक अध्यापिका ने बताया कि शिक्षा मित्र नहीं है। सहायक अध्यापिका शर्मा बताती हैं कि अध्यापकों की कमी से शैक्षिक माहौल तो प्रभावित हो रहा है। बताया कि किसी तरह मैनेज किया जाता है। सबसे अधिक दिक्कत कक्षा एक और दो के बच्चों को संभालने में होती है।
समय: सुबह 10.45
स्थान: प्राथमिक कन्या विद्यालय, साहबगंज
एक बुजुर्ग अध्यापिका तृप्ता रानी किसी तरह बच्चों को संभालने में व्यस्त थीं। कभी-कभी वे इसके लिए रसोइयों का भी सहारा ले रही थीं। पूछने पर बताया कि एक माह पूर्व सहायक अध्यापक विजय गुप्ता का स्थानांतरण हो गया और कुछ वर्ष पूर्व शिक्षा मित्र की शादी हो गयी तो वह भी अपने ससुराल चली गयी। 86 बच्चों वाला यह विद्यालय एक बुजुर्ग महिला अध्यापिका के भरोसे किसी तरह डुगर रहा है। बुजुर्ग अध्यापिका तृप्ता रानी बताती हैं कि दो दिनों से ड्रेस वितरण में ही व्यस्तता रह रही है। अध्यापकों की कमी के चलते होने वाली दुश्वारियों के संबंध में रानी बताती हैं कि मुख्य विषयों पर अधिक जोर देकर बच्चों की नींव मजबूत करने की कोशिश करती हूं। वह कहती हैं कि कुछ कक्षाओं को कंबाइंड भी चलवा देती हूं। एक कक्षा को लिखने को देती तो दूसरे को पढ़ाती हूं।
समय: सुबह 10.55
स्थान: प्राथमिक विद्यालय कन्नौजिया वार्ड
साहबगंज में चलने वाले इस विद्यालय के बारे में पता चला कि यह विद्यालय कन्नौजिया वार्ड के नाम से संचालित हैं। एक अध्यापक एवं शिक्षा मित्र के भरोसे चल रहे इस विद्यालय का इंफ्रास्ट्रक्चर भी बेहद खराब है। किराये के मकान में चल रहे इस विद्यालय के बच्चों को बरामदे और एक छोटे से कमरे में पढ़ाया जा रहा था। शिक्षा मित्र तो मौजूद थी लेकिन प्रधानाध्यापक किसी प्रशिक्षण में गये हुए बताये गये। 59 छात्र संख्या वाले इस विद्यालय में एमडीएम भी बरामदे में ही एक कोने में बनाया जा रहा था।
समय: सुबह 11.05 बजे
स्थान: पूर्व माध्यमिक विद्यालय साहबगंज
70 छात्र संख्या वाले इस विद्यालय में तीन अध्यापक मौजूद थे। प्रधानाध्यापक गणेश प्रसाद और अध्यापिका रेहाना खातून तथा मंजू देवी विद्यालय पर मौजूद थे। बुजुर्ग अध्यापक गणेश प्रसाद बेबाकी से बताते हैं कि विज्ञान और गणित पढ़ाने में काफी मेहनत करनी पड़ती है। नये सिलेबस को बच्चों को सही से पढ़ाया जा सके इसके लिए बुजुर्ग अध्यापक प्रसाद अपने बेटों की भी मदद लेते हैं। हालांकि, विद्यालय में ड्रेस वितरण की तैयारियां चल रही थी। लेकिन बच्चे क्लास में पढ़ रहे थे।
समय: 11.30 बजे
स्थान: प्राथमिक विद्यालय भरवलिया
नगर से सटे विद्यालय पर छात्र संख्या 113 बताया गया। प्रधानाध्यापिका प्रतिमा शुक्ला सहित एक सहायक अध्यापिका तथा दो शिक्षा मित्र विद्यालय पर तैनात हैं। एक शिक्षिका का स्थानांतरण कुछ दिन पूर्व ही हुआ है। प्रशासनिक कामों के कारण इस विद्यालय पर एक और शिक्षिका की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। प्रधानाध्यापिका ने बताया कि शिक्षकों की कमी लेकिन शैक्षिक स्तर पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है।
समय: 2.11 बजे
स्थान: प्राथमिक विद्यालय, सोनवल
नामांकित बच्चों की संख्या 248 इस विद्यालय पर है। शिक्षक तो कम हैं ही इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर भी कोई सुविधा नहीं है। छह वर्ष पूर्व शौचालय बना था वह आज की तारीख में बदहाल है। प्रधानाध्यापक उमेश यादव के अनुसार तीन दिन पूर्व ज्वाइन किये हैं, लिखा-पढ़ी की जाएगी।
समय: 2.20 बजे
स्थान: जूनियर विद्यालय, सोनवल
इस विद्यालय में भी शौचालय का हाल बेहाल है। महिला प्रधानाध्यापिका सुनीता शर्मा स्वयं इस स्थिति को बयां करते हुए बताती हैं कि बच्चियों को काफी असुविधा होती है। कई बार लिखा-पढ़ी की जा चुकी है लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा है।
समय: 2.40 बजे
स्थान: प्राथमिक विद्यालय, मठिया प्रसिद्ध तिवारी
शैक्षिक वातावरण की बात तो दूर की बात है इस विद्यालय में भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। शौचालय की स्थिति बेहद खराब होने के कारण निष्प्रयोज्य है। महिला शिक्षिकाओं तथा बच्चियों को भारी असुविधा और शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है।
समय: 2.55 बजे
स्थान: प्राथमिक विद्यालय त्रिलोकपुर
बच्चों की संख्या 125 है। एक अदद शौचालय तक की सुविधा इस सरकारी विद्यालय पर बच्चों को नही उपलब्ध करायी गयी है। शौचालय तो बना हुआ है लेकिन वह केवल शोपीस के रूप में ही इस्तेमाल हो सकता है।
समय: 2.20 बजे
स्थान: प्राथमिक विद्यालय, पपऊर
प्रधानाध्यापक सुमन चौधरी मौजूद थीं। कार्यरत दो शिक्षा मित्र भी मौजूद थे। 165 बच्चों का जिम्मा तीन लोगों के कंधों पर था। शौचालय पर ताला लटक रहा था। बच्चों ने बताया कि शौचालय का ताला कभी कभार ही खुलता है।
समय: 2.40 बजे
स्थान: प्राथमिक विद्यालय, इंद्रसेनवा
प्रधानाध्यापक मौके पर नहीं मिले। सहायक अध्यापक के जिम्मे एक से पांच तक की कक्षा में पढ़ने वाले 97 बच्चों की जिम्मेदारी थी। शुद्ध पेयजल के लिए लगाया गया हैंडपंप खराब था तो शौचालय पर ताला लटक रहा था।
समय: 3.00 बजे
स्थान: प्राथमिक एवं जूनियर विद्यालय, सपहां बाबू
प्राथमिक विद्यालय में 148 छात्र संख्या तथा जूनियर में 69 की संख्या है। प्राथमिक विद्यालय एक शिक्षक और शिक्षा मित्र के हवाले हैं तो जूनियर विद्यालय सिर्फ एक ही शिक्षक ही मौजूद है। प्राथमिक विद्यालय में शौचालय बना ही नहीं है। जूनियर विद्यालय का शौचालय की स्थिति ऐसी है कि उसमें जाने से डर लगेगा।
समय: 2.30 बजे
स्थान: प्राथमिक विद्यालय बिहुली मिस्फी
प्रधानाध्यापक विद्यालय पर नहीं थे। कार्यरत दो शिक्षा मित्र मौजूद थीं। 114 बच्चों के नामांकन वाले इस विद्यालय में शौचालय झाड़ झंखाड से लुप्त था। बच्चे इस शौचालय है कि नही यह भी नहीं जानते।
कोट
नई भर्ती होने वाली है। शिक्षकों की नियुक्ति पश्चात शिक्षकों की कमी दूर हो जाएगी। रही मानकों की बात तो सरकारी विद्यालयों के लिए कुछ छूट मिली हुई है। शौचालय संबंधी खामियों को दूर करने के लिए डीपीआरओ से बातचीत की गयी है। डीपीआरओ से समन्वय स्थापित कर जनपद के विद्यालयों में खराब पड़े शौचालयों को ठीक करवाया जाएगा।
प्रदीप कुमार पांडेय, बीएसए
बदतर है स्कूलों के शौचालय की दशा
कसया। तमाम कोशिश और पैसा खर्च करने के बावजूद परिषदीय स्कूलों में शौचालयों की दशा बेहद खराब है। सफाई के अभाव में अधिकतर जगहों पर शौचालय इस्तेमाल के लायक ही नहीं हैं। मजबूरन बच्चाें को या तो इन बेहद गंदे शौचालयों का ही प्रयोग करना पड़ता है या फिर उन्हें खुले में जाना पड़ता है। गुरुवार को अमर उजाला टीम ने इन शौचालयों की दशा खुद जाकर देखी।
शौचालय तो हैं उपयोग लायक नहीं
पकवा इनार। कुशीनगर स्थित प्राथमिक विद्यालय में कुल 119 बच्चों का नामांकन है। एक महिला अध्यापक और तीन महिला रसोइया भी हैं। बावजूद इसके यहां एक ही शौचालय है। उसकी भी दशा खराब है। स्कूल के प्रधानाध्यापक राजीव नयन द्विवेदी के मुताबिक सफाईकर्मी कभी आता ही नहीं है। खुला परिसर होने के नाते स्कूल बंद होने के बाद ग्रामीण भी इस शौचालय का इस्तेमाल कर लेते हैं। इसकी वजह से अब यह इस्तेमाल के लायक बचा ही नहीं है। यहां के जूनियर हाईस्कूल परिसर में भी चार शौचालय है जिसमें दो तो झाड़ियों से ही घिरा हुआ है तथा जर्जर हालत में है। प्राथमिक विद्यालय झुंगवा और प्राथमिक विद्यालय विश्वंभरपुर में भी शौचालयों की दशा बेहद खराब है। बच्चियों ने बताया कि शौच के लिए खेतों में जाना पड़ता है।
बीआरसी के स्कूल पर ही नहीं है व्यवस्था
हाटा। इस ब्लाक में तो शौचालयों की स्थिति और भी खराब है। ब्लाक मुख्यालय पर स्थिति प्राथमिक विद्यालय में ही शौचालय की दशा जीर्ण-शीर्ण है। प्रधानाध्यापक विश्राम प्रसाद के मुताबिक यहां का शौचालय 25 साल पुराना है जो अब काम लायक नहीं रहा। हेडमास्टर के मुताबिक वर्ष 2007 से अब तक कई मर्तबा शौचालय निर्माण के लिए पत्र भेजा जा चुका। वर्ष 2009 में स्कूल की जांच करने आए तत्कालीन सीडीओ ने भी शीघ्र नया शौचालय बनवाने का आदेश दिया था लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी। यहां भी छात्राओं को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। कक्षा चार की छात्रा प्रियंका और शालिनी तथा कक्षा पांच की गुड़िया, सुमन और काजल ने बताया कि शौच के लिए उन्हें घर जाना पड़ता है।
खुले में शौच जाते हैं बच्चे
मोतीचक। इस विकास खंड के प्राथमिक विद्यालय रामनगर में 121 बच्चों का नामांकन है लेकिन शौचालय की हालत बेहद खराब है। प्राथमिक विद्यालय बरठा में 195 और बरठा बेलवनिया में 66 बच्चों का नामांकन है लेकिन यहां भी शौचालय प्रयोग लायक नहीं हैं। बच्चों को खुले में शौच के लिए ही जाना पड़ता है।
डीएम का आदेश रहा बेअसर
कसया। संपूर्ण स्वच्छता कार्यक्रम के तहत सभी परिषदीय स्कूलों में अनिवार्य रूप से शौचालय बनवाया जाना है। अब तो स्कूलों के भवन निर्माण के बजट के साथ ही पेयजल और शौचालय का भी बजट अलग से भेजा जाता है। सभी शौचालयों में पानी की व्यवस्था के लिए टंकी और प्रेशर हैंडपंप भी लगवाने का आदेश है। बीते जून महीने में डीएम रिग्जियान सैंफिल ने 15 जुलाई तक हर हाल में शौचालयों की दशा और पानी की सप्लाई व्यवस्था ठीक कराने का आदेश दिया था। इसकी जांच के लिए जुलाई और अगस्त महीने में कम से कम आधा दर्जन बार क्रास चेेकिंग भी करायी गई, बावजूद इसके स्थिति में बहुत फर्क नहीं आया है।

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