कुंडे से लटककर युवक ने की खुदकुशी

Kushinagar Updated Wed, 26 Sep 2012 12:00 PM IST
रामकोला/मेहंदीगंज। रामकोला थाना क्षेत्र के सोहरौना के एक युवक ने सोमवार की रात अपने कमरे की छत से लगे कुंडे से लटककर जान दे दी। सुबह उसके कमरे का दरवाजा बंद देख परिजनों ने जब खिड़की से झांककर देखा तो उसका शव कुंडे से लटकता दिखा। सूचना पाकर मौके पर पहुंची पुलिस ने कमरे का दरवाजा तोड़वाकर शव को बाहर निकलवाया। शव के पास से पुलिस को एक सुसाइड नोट मिला है, जिसे पुलिस अपने साथ लेते गई।
सोहरौना के रहने वाले नरसिंह का पुत्र जितेंद्र रोज की तरह सोमवार की रात खाना खाकर अपने कमरे में सोने गया। सुबह सात बजे तक जब जितेंद्र का कमरा नहीं खुला तो उसके पिता ने आवाज दी। अंदर से आवाज न आने पर उन्हाेंने खिड़की से झांककर देखा तो जितेंद्र का शव कमरे की छत से लगे कुंडे से लटकते दिखी। इसकी सूचना परिजनों ने तत्काल पुलिस को दी। जब पुलिस ने शव को बाहर निकलवाया तो मृतक की जीभ बाहर निकली हुई थी। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पीएम के लिए भेज दिया। बताया जाता है कि शव के पास से मिले सुसाइड नोट में जितेंद्र ने पुलिस के नाम संदेश लिखा है कि वह स्वेच्छा से अपनी जान दे रहा है। उसे उम्मीद है कि उसके न रहने के बाद पुलिस उसके परिजनों को परेशान नहीं करेगी।
पत्नी और बेटे की विरह में टूटा
रामकोला। पहले पत्नी ने छोड़ा और कुछ दिनों बाद बेटे उज्जवल ने हमेशा के लिए साथ छोड़ दिया। इस घटना ने सोहरौना के जितेंद्र को झकझोर कर रख दिया और वह दोनों के विरह में बुरी तरह टूट गया। मानसिक रूप से भी वह परेशान रहता था। बेटे की मौत के बाद भी जितेंद्र उसका नाम अपनी बाइक पर लिखवाकर चलता रहा। फिर भी उसकी परेशानी बढ़ती ही गई। शायद यही कारण था कि जितेंद्र ने जिंदगी से हार मानकर अपनी इहलीला ही समाप्त कर ली। इस मामले का दूसरा पहलू भी बताया जा रहा है। चर्चाओं के अनुसार पत्नी से चल रहे मुकदमे और बेरोजगारी ने भी जितेंद्र की जिंदगी में जहर घोलकर रख दिया था। मानसिक परेशानी का यह भी एक अहम कारण बताया जा रहा है।
अपने तीन भाइयों में जितेंद्र ही ऐसा था जो कोई नौकरी नहीं करता था। इसका एक भाई पुणे तो दूसरा भाई दिल्ली में नौकरी करता है। जबकि जितेंद्र घर पर रहकर खेतीबारी का काम देखता था। बताया जाता है कि करीब चार वर्ष पूर्व जितेंद्र की पत्नी ने उसे छोड़ दिया था। उस समय एक लड़का उज्जवल था। पत्नी के छोड़ने के बाद उज्जवल में ही जितेंद्र अपनी दुनिया देखने लगा। शायद यह भी प्रकृति को मंजूर नहीं था। साल भर पूर्व उज्जवल ने इंसेफेलाइटिस की चपेट में आकर दम तोड़ दिया। उज्जवल के साथ छोड़ने के बाद से ही जितेंद्र की दुनिया बदल गई। मानसिक रूप से परेशान जितेंद्र अपने बेटे का नाम बाइक पर लिखवाकर घूमने लगा। लोगों के कहने पर कहा करता था कि उसका बेटा उसके साथ है और वह खुद भी बेटे के पास जाना चाहता है। जितेंद्र कहता घूमता था कि अब मेरा इस दुनिया में कौन है, जिसके लिए मै जिंदा रहूं। कुछ दिनों पूर्व उसने कुएं में कूदकर जान देने की कोशिश की लेकिन लोगों ने उसे बचा लिया। कुछ दिनों बाद उसने जहरीला पदार्थ खाकर जान देने की कोशिश की लेकिन इस बार भी प्रकृति को जितेंद्र की मौत मंजूर नहीं थी। वह मेडिकल कालेज में जिंदगी और मौत के बीच के जंग में जीत गया था। इसके बाद परिजनों ने जितेंद्र के कहने पर चारपहिया गाड़ी खरीदी थी, जिसको वह चलवाता था। परिजनों का मानना था कि गाड़ी में ही उसका मन लग जाएगा और वह अपने अतीत को भूल जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

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