खनन से खतरे में पावानगर के टीले

Kushinagar Updated Sat, 04 Aug 2012 12:00 PM IST
कसया। कुशीनगर की धरती में सैकड़ों साल से छिपा बुद्धकालीन इतिहास संरक्षण के अभाव में समाप्त होता जा रहा है। जहां पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित घोषित टीलों पर अवैध खनन हो रहा है वहीं कुशीनगर में खुदाई से मिले अवशेष भी संरक्षण के अभाव में क्षरित हो रहे हैं। माथा कुंवर मंदिर परिसर में मिले अवशेष तो साल के चार महीने पानी में ही डूबे रहते हैं।
कुशीनगर जहां भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली है वहीं फाजिलनगर क्षेत्र में जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया था। गुप्तकालीन सभ्यता के भी तमाम चिह्न समय-समय पर यहां मिलते ही रहते हैं। अकेले फाजिलनगर क्षेत्र में ही एक दर्जन टीले ऐसे हैं, जिनमें सैकड़ों साल पुरानी उन सभ्यताओं के अवशेष दबे पड़े हैं। कुशीनगर के उत्खनन के बाद इन टीलों के महत्व को पुरातत्व विभाग ने माना और उनमें से अधिकतर को संरक्षित घोषित कर दिया। इसके बाद आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई। महावीर के महापरिनिर्वाण से संबंधित वीरभारी उस्मानपुर के इर्द-गिर्द जो टीले हैं उनकी स्थिति तो और भी ज्यादा खराब है। इन टीलों और उनमें छिपे पुरातात्विक अवशेषों के बारे में इतिहासकार डा. श्याम सुंदर सिंह ने काफी प्रयास करके साक्ष्य जुटाए और उन पर अपना शोध पत्र भी प्रस्तुत किया है लेकिन परंतु इस इतिहासकार के सारे प्रयासों पर पुरातत्व विभाग की लापरवाही ने पानी फेर दिया है। और तो और भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली होने के नाते दुनियाभर में अपनी पहचान कायम करने वाले कुशीनगर के ऐतिहासिक धरोहरों को भी संरक्षित करने में पुरातत्व विभाग असफल रहा है। यहां के माथा कुंवर मंदिर परिसर में खुदाई के दौरान जो संरचनाएं मिली थीं उनकी सुरक्षा तक का इंतजाम नहीं हो पाया है। नतीजतन, बरसात शुरू होते ही इस मंदिर का अधिकतर हिस्सा पानी में डूब जाता है। भगवान बुद्ध का जिस स्थान पर अंतिम संस्कार हुआ था वह रामाभार स्तूप भी ईश्वर की कृपा से ही सुरक्षित है। स्तूप पर अक्सर ही लोग चढ़ जाते हैं। इससे बौद्धों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं। मुख्य मंदिर में स्थित भगवान बुद्ध की ऐतिहासिक लेटी प्रतिमा को क्षरण से बचाने के लिए टफेड ग्लास लगाने की योजना साल भर बाद ही पूरा नहीं हो सकी है।
डीएम को भेजा पत्र भी काम नहीं आया
जौरा बाजार। भगवान महावीर से जुड़े वीरभारी उस्मानपुर के टीलों पर हो रहे अवैध खनन को रोकने के लिए दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर के प्राचीन इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के विभागाध्यक्ष आचार्य गोरख ने बीते जून माह में ही डीएम को पत्र भेजकर इन टीलों के महत्व को रेखांकित करते हुए सुरक्षा के उपाय करने का अनुरोध किया था। उन्होंने अपने पत्र में इस बात का भी उल्लेख किया है कि यहां कुछ टीले ऐसे हैं, जिन्हें नष्ट होने से बचाने के लिए प्रशासन का सहयोग अति आवश्यक है।
प्रशासन के सहयोग बिना सुरक्षा संभव नहीं
कसया। पुरातात्विक महत्व के इन अवशेषों की सुरक्षा के सवाल पर पुरातत्व विभाग के स्थानीय अधिकारी अविनाश चंद्र त्रिपाठी का कहना है कि जब तक स्थानीय प्रशासन पूरा सहयोग नहीं करेगा तब तक कुछ भी संभव नहीं है। माथा कुंवर मंदिर परिसर में जलजमाव के सवाल पर उनका कहना है कि कसाडा की बैठक में यह प्रस्ताव दिया गया था कि गहरे ड्रेनेज बनवाए जाएं क्योंकि खुदाई से मिले अवशेषों का तल नीचा है। ड्रेनेज गहरा होता तो इधर का पानी भी निकल जाता लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

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