चिक्का-डांडी हुई दूर की कौड़ी

Kushinagar Updated Mon, 23 Jul 2012 12:00 PM IST
पिपराबाजार। गांवाें में नागपंचमी को खेला जाने वाला चिक्का-डांडी अब दूर की कौड़ी हो गई है। इसमें नौजवानों को अपनी ताकत आजमाने का मौका मिलता था। जवानी में इस खेल की आजमाइश कर चुके कई बुजुर्ग आज भी उन दिनों को यादकर अपनी मूंछों को ताव देने लगते हैं। साथ ही आज की पीढ़ी को देह कमाने के प्रति उदासीन देखकर अफसोस भी जताते हैं।
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि नागों को समर्पित है। इस दिन चिक्का-डांडी का विशेष रूप से आयोजन किया जाता है। विशुनपुरा विकास खंड के मोतीपुर गांव के मुखलाल (85), रोंवारी के मथुरा (82), परगनछपरा के लालजी मिश्र (80), नेबुआ नौरंगिया विकास खंड के शेषछपरा निवासी जोखन यादव (70) चिक्का-डंाडी का जिक्र शुरू होते ही भावुक हो उठे। परगनछपरा के कैलाश यादव बताते हैं कि खेल के दौरान हाथ-पैर तक टूट जाते थे। लेकिन खेल भावना के चलते कोई शिकायत नहीं करता था। बताया कि हारने वाला खिलाड़ी अगले साल जीतने की चुनौती दे-लेकर राजी-खुशी माहौल में विदा होता था।
चिक्का-डांडी एक एकड़ या इससे भी ज्यादा जमीन में खेला जाता है। बीच में एक लकीर (डांडी) खींचकर इसी सीमा रेखा के दोनों ओर आठ-आठ या अधिक भी खिलाड़ी दो दलों के रूप में खड़े होते हैं। लकीर से पांच फीट दूर बसहिया खड़ा होता है जो अपनी टीम का कप्तान होता है। बसहिया की पराजय टीम की पराजय मानी जाती है। इस खेल में ताकत और हौसले के दम पर लकीर को पार करने की कोशिश चिक्का ही करता है। कबड्डी की तरह इस खेल में भी बारी-बारी से एक एक खिलाड़ी निकलता है। लेकिन इसमें लकीर पार करने वाला खिलाड़ी यानि चिक्का मौन धारण किए रहता है। चिक्का को लकीर पार करके निकल जाने से रोकने की हर कोशिश प्रतिद्वंद्वी टीम करती है। उसके पकड़े जाने पर उसके अन्य साथी अपनी हद में खींचने के लिए प्रयास करते हैं। फिर दोनों तरफ से चिक्का को अपनी ओर खींचने की कोशिश होती है। पकड़कर दोनों तरफ से अपनी अपनी ओर खींचे जा रहे चिक्का को विपक्षी मारपीट कर पस्त करना चाहते हैं। सभी कोशिशों के बाद भी अगर चिक्का मुंह नहीं खोलता है और बिना पराजय स्वीकार किए वापस खेमे में आ जाता है तो उसे गांव का गौरव माना जाता है। ढोरही के खेलावन यादव, मुन्नी भगत आदि मानते हैं कि आजकल गांवों के राजनैतिक माहौल में खेल भावना कमजोर हुई है।
अकाल मौत से मिलती है मुक्ति
तमकुहीरोड । पं. संतोष पाठक ने बताया कि हिंदू धर्म में चतुर्मास का विशेष महत्व है, जो सावन से शुरू होकर कार्तिक माह तक चलता है। ऐसी मान्यता है कि इन चार महीनों में विशेष पर्व पड़ते हैं, जो नागपंचमी से आरंभ होते हैं। पंचमी तिथि को नाग पूजा करने से अकाल मौत से मुक्ति मिलती है। इस दिन कटहल के पत्ते पर दूध लावा रखकर नाग देवता को चढ़ाया जाता हैै। नाग पूजा प्राचीन काल से हमारी धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई है।

Spotlight

Most Read

Meerut

दो सगी बहनों से साढ़े चार साल तक गैंगरेप, घर लौट आई एक बेटी ने सुनाई आपबीती

दो बहनों का अपहरण कर तीन लोगों ने साढ़े चार वर्ष तक उनके साथ गैंगरेप किया। एक पीड़िता आरोपियों की चंगुल से निकल कर घर लौट आई। उसने परिवार को आपबीती सुनाई।

21 जनवरी 2018

Related Videos

यूपी का रिश्वतखोर लेखपाल कैमरे में कैद

ये वीडियो एक लेखपाल का है जो किसान से उसकी एक रिपोर्ट के लिए पांच हजार रुपये की मांग कर रहा है। वीडियो कुशीनगर की खड्डा तहसील का बताया जा रहा है।

7 दिसंबर 2017

आज का मुद्दा
View more polls
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking Hindi news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper