इंजीनियरों का गांव है कुरमौटा मंझरिया

Kushinagar Updated Wed, 18 Jul 2012 12:00 PM IST
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कसया(कुशीनगर)। पिछड़ेपन की पहचान कुशीनगर जनपद में एक गांव ऐसा भी है जिसकी सोंधी मिट्टी में तपकर हर साल इंजीनियर पैदा होते हैं। इस गांव का एक इंजीनियर तो आईआईटी कानुपर में है जिसे राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। आधा दर्जन इंजीनियर ऐसे हैं जो विदेशों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वर्तमान में 90 इंजीनियर इस गांव के हैं। इतना ही नहीं एक दर्जन युवा इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं।
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यह गांव है हाटा विकास खंड का कुरमौटा मंझरिया। सात पुरवों में बंटे इस गांव की कुल आबादी करीब छह हजार है। इसमें सर्वाधिक 70 प्रतिशत घर सैंथवारों(पिछड़ी जाति) के हैं। इसके बाद 20 प्रतिशत आबादी ब्राह्मणों की है। शेष 10 प्रतिशत में अनुसूचित और पिछड़ी जाति के अन्य लोग निवास करते हैं। जिले के अन्य गांवों की तरह यहां भी खेती ही मुख्य पेशा है। जर्जर गरीबी और बेरोजगारी की मार झेलते इस गांव में आशा की पहली किरण दिखी वर्ष 1977 में, जब इस गांव के मारकंडेय ओझा ने जनता इंटर कालेज सोहसा मठिया से इंटरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के पश्चात एचआईटी कानपुर में बीटेक में प्रवेश लिया। पढ़ाई पूरी करने के बाद मारकंडेय ओझा एक प्राइवेट कंपनी में अच्छे पद पर नौकरी पा गए। वर्ष 1980 में इस गांव के वशिष्ठ सिंह ने भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और विभिन्न कंपनियों में नौकरी करते हुए आज नाइजीरिया में एक कंपनी के प्रबंधक पद पर कार्यरत हैं। इसके बाद तो कारवां आगे ही बढ़ता गया। शेषनाथ, श्रीनिवास, अवधेश, हीरामन प्रसाद, प्रमोद, दिवाकर सिंह, प्रदीप सिंह, आशुतोष सिंह, विजय प्रताप सिंह, सुनील सिंह, सुशील सिंह, अश्विनी सिंह, अनिकेत सिंह समेत अब तक 90 लोग इस गांव के इंजीनियर बन चुके हैं। इसके अलावा एक दर्जन से ज्यादे नौजवान प्रदेश के विभिन्न इंजीनियरिंग कालेजों में पढ़ाई भी कर रहे हैं। इस गांव के निवासी श्रीनिवास आईआईटी कानुपर में लेक्चरर हैं। उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
अधिकतर की प्रारंभिक पढ़ाई यहीं हुई
इस गांव के अधिकांश इंजीनियरों की प्राथमिक शिक्षा श्रीराम जानकी दुर्गा जी प्राथमिक विद्यालय सतगड़ही में हुई है। कुरमौटा के रहने वाले रामकृपाल सिंह इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक रहे। इनके कठोर अनुशासन और देखरेख में इन मेधावियों को बचपन से ही कुछ बनने की प्रेरणा मिलती रही। प्राथमिक शिक्षा के बाद सभी जनता इंटर कालेज सोहसा मठिया से इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई पूरी किए। ग्रामीणों के अनुसार जनता इंटर कालेज सोहसा मठिया में जब श्रीराम पांडेय प्रधानाचार्य हुआ करते थे तो कालेज को शांति निकेतन की संज्ञा मिली हुई थी। अनुशासन और पढ़ाई इस कालेज की पहचान थी।
इंजीनियरों की समिति देती है प्रोत्साहन
इंजीनियरों के इस गांव में नई पीढ़ी को सही मार्गदर्शन और समुचित प्रोत्साहन देने के लिए एक समिति बनी हुई है। मां सतगड़ही ग्रामीण विकास समिति नाम की यह संस्था हर साल मेधावी छात्रों की परीक्षा कराती है और उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए उचित मार्गदर्शन देती है। संस्था आर्थिक रूप से कमजोर मेधावियों को आर्थिक सहायता देती है। इस समिति काअध्यक्ष गांव के प्रथम इंजीनियर और इस वक्त अहमदाबाद में प्रबंधक पद पर कार्यरत मारकंडेय ओझा को बनाया गया है। आईआईटी कानुपर के लेक्चरर श्रीनिवास जब भी गांव आते हैं तो वे मेधावी छात्रों को खोजकर जरूरी टिप्स और प्रोत्साहन देते हैं।
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