गाड़ी, पक्का मकान है, पर कार्ड गरीबों वाला

Kushinagar Updated Sun, 15 Jul 2012 12:00 PM IST
पडरौैना। दो पहिया गाड़ी है, पक्का मकान है, घर में सारी सुख सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन राशन कार्ड गरीबों वाला है। नगर में राशन कार्डों के सत्यापन के दौरान कई बार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जब व्यक्ति के लिविंग स्टैंडर्ड एवं उसकी सोच को लेकर राजस्वकर्मी अचरज में पड़ जाते हैं। सवाल है आखिर कौन सी कमी या लिप्सा है, जो हमें नैतिक रूप से कमजोर कर रही है या क्यों सरकारी तंत्र गरीबों के हक को साधन संपन्न लोगों की दर पर पहुंचा कर मत्था टेकने को मजबूर है ?
कुशीनगर जनपद में गरीबों के निवाले पर साधन संपन्न लोग डाका डाल रहे हैं। राशन माफियाओं पर शिकंजा कसने के क्रम में जब जिलाधिकारी रिग्जियान सैंफिल ने शहरी क्षेत्रों के राशन कार्डों का सत्यापन कराना शुरु किया तो साधन संपन्न लोगों की सोच एवं सरकारी तंत्र में जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार की कहानी सामने आने लगी है। सत्यापन कर रहे लेखपाल अजीत लाल श्रीवास्तव बताते हैं कि एक-एक घर में तीन-तीन राशन कार्ड मिल रहा है। फर्जी नामों से कार्ड आम बात है। हकीकत यह है कि बहुत से साधन संपन्न लोगों ने गरीबों वाला राशन कार्ड बनवा लिया है। कई अन्य लेखपाल बताते हैं कि डोर टू डोर जब वे लोग आलीशान बिल्डिंग में रहने वाले व्यक्ति के घर जा रहे हैं तो ऐसे लोग लाल एवं सफेद कार्ड दिखा रहे हैं। सत्यापन करने वाले लोगों का कहना है कि हकीकत यही है कि गरीबों को उनकी हैसियत के मुताबिक राशन कार्ड नहीं मिला है। सरकारी सूत्रों की मानें तो नगर में 25 प्रतिशत ऐसे लोगों का गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाला कार्ड बनवा दिया गया है, जो साधन संपन्न हैं तथा उनकी आय लाखों में है।
समाज शास्त्री डा. पीके सिन्हा इसे भौतिकवादी विचारधारा का दोष मानते हैं। उनका कहना है कि जो भी साधन संपन्न हैं, वे कमजोर, गरीब का आर्थिक, शारीरिक एवं मानसिक शोषण करने में लिप्त हैं। उन्होंने कहा कि सामाजिक स्तर ही नहीं, पारिवारिक स्तर पर भी यह अब सामने आने लगा है। हम अधिक से अधिक बटोरना चाहते हैं, किसी भी सूरत में। तंत्र जब भ्रष्टाचार की चपेट में होगा, तो इस तरह की विचारधारा को बढ़ावा ही मिलेगा। वह कहते हैं कि सब्सिडी पर मिलने वाले रसोई गैस सिलेंडर का ही हाल देखिये, साल में सब्सिडी वाले 100 सिलेंडर तो सांसद लेेते हैं। आखिर उनको क्या कमी है। डा. अरुण प्रताप सिंह कहते हैं कि यह तस्वीर समाज के उस लूट खसोट कर की ओर इशारा करती है, जिसमें गरीब तो पिस रहे हैं, लेकिन लुटेरे आपस में समाजवाद का परिचय दे रहे हैं।

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