जान की दुश्मन बन गई वानर सेना

Kaushambi Updated Mon, 20 Jan 2014 05:43 AM IST
मंझनपुर/मूरतगंज/करारी। दोआबा में बंदरों की बढ़ती जनसंख्या लोगों के लिए मुसीबत बनती जा रही है। इनकी धमाचौकड़ी से कई लोगों की जान खतरे में भी पड़ चुकी है। कइयों को बंदरों ने काटकर घायल कर दिया है। करीब सालभर में करीब 800 लोग अस्पताल पहुंच चुके हैं। वहीं कई लोग बंदरों के हमले से बचने के लिए छत से छलांग लगाने से भी नहीं चूके। छत से कूदे सोनारन का टोला करारी के राकेश वर्मा का एक पैर तो करीब दो साल बाद भी पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाया है। वह अब भी लंगड़ाकर चलता है। इसके बावजूद संबंधित विभाग लोगों को बंदरों के उत्पात से छुटकारा नहीं दिला रहा है। महकमा बजट का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लेता है।
जिले के लोग इन दिनों बंदरों के उत्पात से परेशान है। बताया जाता है कि कई वर्षों से चित्रकूट के जंगलों में रहने वाले बंदरों ने अब कौशाम्बी को नया ठिकाना बना लिया। करीब पांच साल से धीरे-धीरे यहां इनकी आबादी बढ़ती जा रही है। मंझनपुर, करारी, भरवारी, मूरतगंज, मनौरी, चरवा, सरायअकिल, सिराथू आदि कस्बों में तो आलम यह है कि प्रत्येक घर की छत पर इनकी धमाचौकड़ी देखी जा सकती है। इसके कारण लोगों को जाड़े में छत पर धूप में बैठना, कपड़े सुखाना आदि दूभर हो जाता है। बंदरों के उत्पात से लोग सहमे हुए हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो जनवरी 2013 से दिसंबर तक बंदरों ने करीब 800 लोगों को काटकर जख्मी कर चुके हैं। वहीं कइयों ने तो हमले से बचने के लिए जिंदगी को ही दांव पर लगा दिया। मूरतगंज की रातरानी, गुड़िया, करारी के राकेश वर्मा, शबनूर बेगम, आयशा खातून, इसरार अहमद, अनीता जायसवाल, शहजाद आलम अंसारी, संजय जायसवाल, जुबैर अहमद आदि तो बंदरों के हमले से बचने के लिए छत से छलांग लगाने से भी नहीं चूके।
सरायअकिल कस्बे के विजय बहादुर उर्फ खुन्नू की लड़की श्वेता (09) करीब दो साल पहले छत पर खेल रही थी। इसी बीच अचानक छत पर झुंड में बंदर आ गए। बंदरों को देखकर श्वेता छत से नीचे गिर गई थी। इससे उसकी मौत हो गई थी। सोनारन को टोला करारी के राकेश वर्मा का कहना है कि करीब दो साल पहले का हादसा जब भी याद आता है, तो उनकी रूह कांप जाती है। छत पर चढ़ते ही एक बंदर ने हमला कर दिया था। जान बचाने के लिए छत से कूदने के अलावा कुछ नहीं समझ में आया था। कूदने से घायल हो गया था। इलाज में करीब 20 हजार रुपये खर्च हो गए। फिर भी पैर पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ है। करारी की शंकुतला जायसवाल का कहना है कि छत पर बंदरों की धमाचौकड़ी से हमेशा डर लगता है। अब तो बेखौफ हो चुके बंदर घर में भी उत्पात मचाने लगे हैं। खाने का सामान उठा ले जाते हैं। जब से बंदर ने काटा है, छत पर जाना बंद कर दिया है। अशोक नगर के रामलौटन चौरसिया ने बताया कि बंदरों के कारण जाड़े में छत पर धूप में बैठना अब सपना हो गया है। एक बार छत पर लेटे रहने के दौरान एक बंदर का बच्चे बिस्तर पर चला आया था। भय के कारण चादर फेंकने पर बच्चा उसी में फंस गया था। इसी बीच झुंड ने बंदरों ने घेर लिया था। शोर मचाने पर पड़ोसियों ने जान बचाई। बंदरों ने घर के छह सदस्यों को घायल कर चुके हैं। करारी के उमाशंकर चौरसिया का कहना है कि बंदरों ने जीना दुश्वार कर दिया है। बंदरों ने बेटी, बेटे, पत्नी के बाद उसे भी काटकर लहूलुहान कर दिया था। बंदरों के उत्पात से निजात दिलाना जरूरी है।
मूरतगंज की रातरानी देवी का कहना है कि अब बंदर को देखने से भी डर लगता है। हादसे वाले दिन छत पर दाल सुखाने को रखा था। इसी बीच बंदर आ गए और दाल खाने लगे थे। इन्हें भगाने की कोशिश की। इसपर बंदरों ने उसे ही काटने के लिए दौड़ा लिया था। जान बचाने के लिए भागी, सामने कुछ नहीं दिखा, तो छत से ही कूद गई थी। इससे वह घायल हो गई थी। बंदरों के डर से अध्यापक भी हमेशा छड़ी लिए रहते हैं। इसके बाद भी करीब छह महीने पहले बंदरों ने मूरतगंज के कस्तूरबा गांधी स्कूल में धावा बोल दिया था। उस दौरान सोनम, अल्तमस आदि को बंदरों ने लहूलुहान कर दिया था। इसके बाद से ये बच्चे स्कूल जाने से कतराने लगे हैं। डीएफओ आरडी पांडेय का कहना है कि कौशाम्बी के कुछ हिस्सों में बंदरों से समस्या हो सकती है। हालांकि इनका उत्पात ऐसा ही नहीं है, जिसे बड़ी समस्या माना जाए। यदि किसी इलाके में बंदर ज्यादा परेशान कर रहे हों तो वहां के लोगों को चाहिए कि वे लिखित शिकायत करें। उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा जाएगा। फिलहाल बंदरों को पकड़ने के लिए विभाग के पास अलग से कोई बजट नहीं है।

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