प्रेमपाल के माता पिता भी नहीं बने सहारा

Kasganj Updated Tue, 04 Dec 2012 05:30 AM IST
अमांपुर। विकलांग प्रेमपाल के अपने माता-पिता भी उसका सहारा नहीं बन पाए। वे उसे दस वर्ष की आयु में ही बेसहारा छोड़कर दिल्ली चले गए। लेकिन प्रेमपाल ने हार नहीं मानी। अब वह अपने बलबूते पर अपना जीवन यापन कर रहा है।
नादरमई निवासी प्रेमपाल जन्म से ही विकलांग पैदा हुआ। विकलांग बच्चे को देखकर परिवारीजन चिंतित हो उठे। दस वर्षों तक तो उन्होंने अपने पुत्र प्रेमपाल का पालन पोषण जैसे तैसे किया। लेकिन इसके बाद प्रेमपाल उन्हें बोझ नजर आने लगा। विकलांग प्रेमपाल को छोड़कर माता पिता व अन्य परिवारीजन दिल्ली चले गए। लेकिन प्रेमपाल ने हार नहीं मानी। जीवन यापन करने के लिए खेतों में मेहनत मजदूरी करने के साथ ही वह चारपाई बुनने के हुनर में माहिर हो गया। आज यही उसका जीविकोपार्जन का साधन है।
इसके अलावा कसबे में कई ऐसे लोग हैं, जो विकलांगता को चुनौति देकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। गांव बरसौंणा में रहने वाले हुकु मसिंह के पुत्र इतवारीलाल दोनों टांगों से विकलांग होते हुए भी अपने बीवी, बच्चों का भरण पोषण कर रहे हैं। उन्होंने सिलाई, बुनाई में महारत हासिल कर ली है। जिससे वह दिल्ली में सिलाई, बुनाई का काम करके एक अच्छी तरह जीवन यापन कर रहे हैं। भाऊपुरा निवासी श्यामसिंह एक टांग से विकलांग होते हुए भी खेती के काम में अपने माता-पिता की मदद कर रहा है। विकलांग रिंकू, प्रदीप, सर्वेश, हरवीर, अरविंद भी अपने शारीरिक रूप से अक्षम होने पर भी दुकान आदि का धंधा करके आत्मनिर्भर बने हुए हैं।

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