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किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार..., पशुओं के प्रति अनूठा है इनका प्रेम, ऐसे कर रहे सेवा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जालौन Published by: शिखा पांडेय Updated Sat, 17 Apr 2021 02:39 PM IST

सार

कुछ ऐसे लोग हैं जो जानवरों के दर्द का अहसास कर न सिर्फ उनकी सेवा करते हैं बल्कि उन्हें अपनों सा प्यार भी देते हैं। इन पशु प्रेमियों को जहां पर भी किसी जानवर के घायल होने की सूचना मिलती है, वे दवाओं और खाने पीने के सामान के साथ खड़े नजर आते हैं।
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पशु प्रेमी
पशु प्रेमी - फोटो : अमर उजाला

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विस्तार

यूपी में जालौन जिले के उरई में कुछ ऐसे लोग हैं जो जानवरों के दर्द का अहसास कर न सिर्फ उनकी सेवा करते हैं बल्कि उन्हें अपनों सा प्यार भी देते हैं। ऐसे पशु प्रेमी जिले में भी हैं, जिन्हें घायल पड़े कुत्तों, बंदरों और गाय, सांड़ आदि का इलाज करने के लिए न तो किसी एनजीओ की मदद की दरकार है और न ही सरकार से किसी भी तरह के प्रमाणपत्र की आवश्यकता।
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इनका काम तो सिर्फ ‘किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार...’ गीत की तर्ज पर घायल पशुओं की सेवा करना ही होता है। इन पशु प्रेमियों को जहां पर भी किसी जानवर के घायल होने की सूचना मिलती है, वे दवाओं और खाने पीने के सामान के साथ खड़े नजर आते हैं।


घायल कुत्तों की तकलीफें दूर करते उमाकांत 
आवारा कुत्तों से होने वाली परेशानी को बयां करने वाले तो तमाम मिल जाएंगे लेकिन सड़क पर घायल पड़े किसी कुत्ते को देखकर रुकने वाले बहुत ही कम मिलेंगे। पटेल नगर निवासी उमाकांत (23) को रास्ते में कहीं पर भी कोई घायल कुत्ता दिखता है तो उनके कदम स्वयं ठहर जाते हैं। उमा बताते हैं कि वे करीब बीते सात सालों से घायल आवारा कुत्तों की सेवा कर रहे हैं। कभी बच्चे तो कभी बड़े बुजुर्ग उन्हें किसी घायल कुत्ते की जानकारी देते हैं तो वे तत्काल वहां पहुंचकर उस कुत्ते का इलाज शुरू कर देते हैं। कुत्ते के जख्मों पर न सिर्फ दवा और पट्टी ही करते हैं बल्कि जब तक वह आवारा कुत्ता चलने के लायक नहीं हो जाता, उसके लिए दूध और रोटी का इंतजाम भी करते हैं। अब तक वे पचास से अधिक कुत्तों का इलाज कर उन्हें ठीक कर चुके हैं।

मवेशियों की तकलीफ सुनकर दौड़ पड़ते हैं बाबा 
कालपी के मनीगंज मोहल्ले के निवासी राजदीप गुप्ता को कुछ लोग बाबा और कुछ लोग जानवरों का डॉक्टर ही इसलिए कहते हैं कि उन्हें जहां भी किसी गाय अथवा सांड़ के घायल होने की सूचना मिलती है तो बाबा वहां खड़े नजर आते हैं। इसके बाद बाबा उस गाय के जख्मों पर मरहम लगाते हैं और उसकी पूरी देखरेख का जिम्मा उठाते हैं। बाबा करीब नौ-दस साल से घायल मवेशियों की सेवा के कार्य में जुटे हैं। उनके इसी कार्य को देखते हुए उन्हें पालिका ने एक गोशाला में मवेशियों की देखभाल की जिम्मेदारी सौंप रखी है। बाबा बताते हैं कि अक्सर घायल मवेशियों को देख लोग उन्हें हांककर स्वयं से दूर करने का प्रयास करते हैं लेकिन उनका मन ऐसे दृश्यों को देखकर और भी विचलित हो जाता है। बेजुबान जानवरों की जितनी हो सके सेवा ही की जानी चाहिए।

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