इलाज का करें इंतजार अभी डॉक्टर हैं लाचार

Kanpur Updated Tue, 25 Sep 2012 12:00 PM IST
मनोज चौरसिया
कानपुर। तेज बुखार... फिर मौत। माह भर से कहर बरपा रही यह बीमारी शहर में डेढ़ सौ से अधिक लोगों को लील चुकी है और सैंकड़ों लोग इसकी चपेट में हैं... पर स्वास्थ्य विभाग इस बीमारी का इलाज ढूंढ़ना तो दूर इसके लिए जिम्मेदार वायरस का पता तक नहीं लगा सका है। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल से लेकर संबंधित विभागों के विभागाध्यक्ष और कई प्रोफेसर अभी इस उधेड़बुन में ही हैं कि कहीं कोई ‘स्थानीय वायरस’ तो सक्रिय नहीं हो गया है। अब इस गुत्थी को सुलझाने के लिए वायरस की जांच पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) से कराने का फैसला किया गया है। प्रिंसिपल ने सोमवार को माइक्रोबायोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष को पुणे स्थित देश के सबसे बड़े वायरोलॉजी सेंटर से टाईअप करके वायरस का पता लगाने के निर्देश दिए।
इस महीने की शुरुआत से ही शहर और आसपास के जिलों में वायरल फीवर का हमला शुरू हुआ। रोगियों में मलेरिया, डेंगू, जापानी इंसेफलाइटिस से लेकर स्वाइन फ्लू तक की पुष्टि हुई। दुखद बात यह है कि तेज बुखार के बाद कुछ मरीजों में सांस लेने में दिक्कत के बाद किडनी खराब होने के बाद डेथ हो रही है तो कुछ का हार्ट, लीवर, ब्रेन पर असर पड़ रहा है। प्लेटलेट्स काउंट्स घटने के भी मामले सामने आ रहे हैं। मेडिकल कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.विशाल गुप्ता के अनुसार वायरस ने अपना रूप बदल लिया है। पर यह पता नहीं चल पाया है कि मौत की वजह कौन सा वायरस है। मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ.नवनीत कुमार, माइक्रोबायोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.अतुल गर्ग और मेडिसिन विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ.रिचा गर्ग ने बताया कि कानपुर में कोई भी वायरस सक्रिय हो सकता है। डेढ़ लाख वायरस में से करीब पांच हजार वायरस के नाम पता हैं। इनमें से 8 - 10 वायरस की ही ज्यादातर जांचें होती हैं। माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष के अनुसार यह कोई स्थानीय वायरस हो सकता है। इसकी वजह बताते हुए उन्होंने तर्क दिया कि गोरखपुर जिले में सात साल पहले दिमागी बुखार से बड़े पैमाने पर मृत्यु हुई थीं। तब इन सभी मौतों की वजह ‘एनसिफलाइटिस सिंड्रोम’ बताया गया था। यह इन्फेक्शन जापानी इंसेफलाइटिस से होता है। वहां के मरीजों के सैंपल पुणे स्थित एनआईवी भेजे गए, पर स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई। तब एनआईवी ने अमेरिका स्थित एसडीसी सेंटर के साथ संयुक्त रिसर्च की, उससे पता चला कि गोरखपुर में जितनी मौतें हुई हैं, उनमें से 40 फीसदी मौतें ‘एनसिफलाइटिस सिंड्रोम’ की वजह से हुईं, जबकि शेष मौतें ‘एन्ट्रो वायरस’ की वजह से हुईं। यह स्थानीय वायरस है, जो गंदे पानी में रहता है। इसी तरह यहां भी मौत की वजह कोई स्थानीय वायरस हो सकता है।

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