किराया ‘हाई’, रफ्तार ‘स्लो’

Kanpur Updated Mon, 20 Aug 2012 12:00 PM IST
राम महेश मिश्र
कानपुर। ‘नाम बढे़ और दर्शन छोटे’ ये बात रेलवे पर सटीक बैठती है। कोई 7 साल पहले तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने सुपर फास्ट ट्रेनों की संख्या दोगुनी कर दी थी। इसके पीछे तर्क दिया था ये ट्रेनें मेल ट्रेन से तेज चलेंगी और यात्रियों का समय बचेगा। पर हकीकत इससे कोसो दूर है। अक्सर दोनों ट्रेनें अपने ठिकानों पर एक साथ पहुंचाती हैं। कई बार तो मेल ट्रेन सुपरफास्ट से पहले पहुंच जाती है। ऐसे में इस आदेश से यात्रियों का तो भला नहीं हुआ, हां रेलवे का जरूर भला हो गया। अब सवाल ये उठता है कि यात्रियों के साथ ये धोखाधड़ी क्यों? रेल उपयोगकर्ता परामर्शदात्री की राष्ट्रीय सलाहकार समिति (रेलवे बोर्ड) के सदस्य शेख मोहम्मद ने इस तुगलकी फैसले को बंद कराने के लिए रेल मंत्री को पत्र लिखा है। साथ ही कहा है कि सितंबर में प्रस्तावित बैठक में इस यात्री विरोधी फैसले को वापस कराने का पूरा प्रयास होगा।
फजलगंज निवासी श्याम किशोर ने इलाहाबाद जाने के लिए रीवा एक्सप्रेस का टिकट लिया तो काउंटर पर बैठे बाबू ने 61 रुपये लिए। वह सुबह 6:15 बजे कानपुर सेंट्रल से चले। फतहेपुर रुकते हुए रीवा एक्सप्रेस दिन में 9:58 बजे इलाहाबाद पहुंची। वापसी में उन्होंने संगम एक्सप्रेस से कानपुर तक का टिकट लिया तो वह उन्हें 52 रुपये में पड़ा। ट्रेन इलाहाबाद से शाम करीब 5:30 बजे चली और कानपुर सेंट्रल रात 9:20 बजे आकर खड़ी हो गई। समय में केवल आंशिक अंतर आया लेकिन भाड़े में 9 रुपये का अंतर। कारण रीवा एक्सप्रेस सुपर फास्ट है जबकि संगम एक्सप्रेस नान सुपर फास्ट। रेलवे में बैकडोर से यात्रियों की जेब हल्की करने का खेल लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल में हुआ। उन्होंने सीधे तौर पर किराया न बढ़ाकर बैक डोर से जेबें हल्की करने के हथकंडे अपनाए। उनका दावा था कि मेल ट्रेनों की अपेक्षा सुपर फास्ट ट्रेनें पौन से एक घंटे पहले पहुंचेगी।
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कानपुर से गुजरने वाली सुपर फास्ट ट्रेनें

हावड़ा, दिल्ली, लखनऊ, मुंबई रूटों की निकलती है 103 सुपर फास्ट ट्रेनें
ट्रेनों का रोजाना औसतन लोड होता लगभग 60,000 यात्री
रोजाना 9 रुपये प्रति यात्री अधिक आय बढ़ी 6,00000 रुपये

कानपुर-लखनऊ रूट का भाड़ा एक नजर में

ट्रेन किराया समय लेती है
मेमू 12 रुपए 100 मिनट में
मेल 28 रुपए 85 मिनट में
सुपर फास्ट 37 रुपए 80 मिनट में

‘2’ नंबर के फेर में पड़ा लोड
रेल यात्रियों की जेब 2 नंबर के फेर में हल्की होती है। हुआ यूं कि जब ट्रेनों को सुपर फास्ट का दर्जा दिया गया तो उन ट्रेनों के नंबर बदलने पडे़े। नान सुपर फास्ट ट्रेनों के आगे 2 जोड़ दिया गया।
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गंतव्य तक बचता है समय
सुपर फास्ट ट्रेनें बोर्ड से तय होती है। क्योंकि बीच के ट्रैक पर अन्य ट्रेनों का लोड और समय यात्रियों की डिमांड से तय होता है। लेकिन, प्रारंभिक स्टेशन से गंतव्य तक पहुंचने में मेल और सुपर फास्ट ट्रेनों के समय में आधे घंटे का अंतर रहता है। रही बात बराबर पहुंचने की तो इसके पीछे कई कारण होते हैं। कहीं सुपर फास्ट रास्ते में फंस गई और पीछे से आ रही मेल समय पर निकलती रही तो दोनों के पहुंचाने का समय एक होता है।
- संदीप माथुर सीपीआरओ-उत्तर मध्य रेलवे




रेलवे की समयसारिणी
ट्रेन समय छूटने का समय पहुंचने का
मेल ट्रेन गोरखपुर-यशवंतपुर लखनऊ से 11:50 (दिन में) 1:10 बजे कानपुर
आगरा इंटरसिटी 2179 लखनऊ से 3:45 (दिन में) 5:20 बजे कानपुर
रीवा एक्सप्रेस कानपुर से 6:20 (सुबह) 9:48 बजे इलाहाबाद
संगम एक्सप्रेस इलाहाबाद से 5:35 (शाम) 9:20 बजे कानपुर
नोट गोरखपुर-यशवंतपुर, संगम नान सुपर फास्ट जबकि दूसरी ट्रेने सुपर फास्ट हैं। समय में विशेष अंतर नहीं

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