हास्पिटल डेड, स्टाफ अप टू डेट

Kanpur Updated Tue, 14 Aug 2012 12:00 PM IST
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कानपुर। साउथ सिटी के दो अस्पताल जागेश्वर और बीएन भल्ला को नीति-नियंता न जीने दे रहे हैं, न मरने। इनके लिए यह जुमला इस लिए इस्तेमाल करना पड़ रहा है कि निगम ने इन्हें 18 साल पहले डेड घोषित कर दिया, मगर दो डॉक्टरों समेत कई अधीनस्थ स्टाफ आज भ्ी यहां बिना काम के वेतन ले रहे हैं। सवाल सिर्फ बिना काम के वेतन का नहीं, अगर दोनों अस्पतालों को सहीं ढंग से संचालित कर दिया जाए साउथ सिटी के निवासियों की एक बड़ी समस्या दूर हो जाए । ऐसा हो जाए तो हैलट और उर्सला अस्पतालों पर मरीजों का दबाव भी कम हो जाएगा। अमर उजाला ने सोमवार को इन दोनों अस्पतालों का जायजा लिया तो अचरज हुआ कि एक तरफ तो नगर निगम बजट का रोना रोता रहता है और यहां बैठे ठाले वेतन बांट रहा है।
1- गोविंदनगर का जागेश्वर अस्पताल
गोविंदनगर मुख्य मार्ग पर स्थित जागेश्वर अस्पताल में कभी नवजात बच्चों की किलकारियां गूंजती थी। सड़क हादसे में घायल लोगों को अस्पताल की इमरजेंसी नई जिंदगी देती थी। आज अस्पताल के गेट से अंदर पसरा सन्नाटा वह दिन लद जाने का अहसास कराता है। सभी वार्डों में ताले लटकते मिले, चैनल पर कुत्ता अलसाए चौकीदार की तरह सुस्ता रहा है। सूनी गैलरी में धीरे-धीरे आती महिला से पूछा तो उसने खुद को एएनएम बताया। पर उसने अपना नाम नहीं बताया। कुछ और पूछने से पहले ही उसका जवाब था पूरा अस्पताल बंद है, और जानकारी करनी हो तो सुबह आना। तब ओपीडी के डाक्टर मिल जाएंगे।

अस्पताल का निर्माण- 1955
डेड घोषित किया गया- 1995
बेड की संख्या- 75
कार्यरत स्टाफ- 1 डाक्टर, 2 स्टाफ नर्स, 1 सिस्टर, 4 वार्ड ब्याय, 5 सफाई कर्मी और 1 एएनएम

2- बाबूपुरवा का बीएन भल्ला अस्पताल
भल्ला अस्पताल का खंडहर बताता है कि किसी समय इमारत कितनी बुलंद रही होगी। अस्पताल में आज मरीजों की जगह आवारा जानवर घूमते रहते हैं। दीवारों का साथ छोड़ता प्लास्टर, टूटे खिड़की, दरवाजे, उस पर मकड़ी के जाले और फर्श पर बिखरी गंदगी देखकर नहीं लगता है कि कभी यहां डॉक्टर और सिस्टर आते होंगे। अस्पताल गेट से लेकर भीतर तक कोई भी नजर नहीं आया। जबकि वेतन रजिस्टर पर डाक्टर, नर्स और सफाई कर्मी मिलाकर करीब 18 कर्मचारी है। लेकिन, काम नहीं तो कोई नहीं, वाला हाल है। आसपास के लोगों की माने तो अस्पताल का स्टाफ सुबह वेतन रजिस्टर पर साइन करने के बाद दिखाई नहीं देता है। इसके बाद यहां स्मैकियों, जुआरियों और अराजकतत्वों की महफिल सज जाती है।

अस्पताल का निर्माण- 29 जून 1968
पसरा सन्नाटा- करीब 2001 से
बेड की संख्या- 50
वेतन पाने वाला स्टाफ- 18

अस्पताल चलाना मुश्किल, स्टाफ पर होगा विचार
नगर निगम के पास फिलहाल इतना धन नहीं है कि अस्पतालों को फिर से चलाया जा सके। रही बात स्टाफ के बैठे बिठाए सैलरी उठाने की तो इस पर जरूर विचार किया जाएगा।
यूपी अग्रवाल, मुख्य चिकित्सा अधिकारी (नगर निगम)

राज्य सरकार को सौंपे जाएं अस्पताल
नगर निगम बैठे बिठाए स्टाफ को वेतन दे सकता है तो अस्पताल को भी चला सकता है। यदि उनके पास धन नहीं है तो इन अस्पतालों को राज्य सरकार के हैंडओवर क्यों नहीं किया जाता है ? कम से कम दक्षिण वासियों को कुछ तो मेडिकल सुविधाएं मिलेंगी।
- ओमेंद्र भारत, जनराज्य पार्टी

इन इलाकों को होगा फायदा
दोनों अस्पतालों को आक्सीजन मिल जाए तो मुंशीपुरवा, बाबूपुरवा, सुक्खापुरवा, जाटनपुरवा, जूही, ट्रांसपोर्टनगर, लोको, बगाही भट्ठा, नौबस्ता, हंसपुरम, बर्रा, किदवईनगर, साकेतनगर, गोविंदनगर, यशोदानगर, नौबस्ता, दबौली, गुजैनी, रतनलाल नगर इत्यादि क्षेत्र के लोगों को मेडिकल सुविधा का लाभ मिलेगा।

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