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‘हवालात’ जाने को बेताब दिखे युवा

Kanpur Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
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कानपुर। हम हवा में लात चलाते हैं वो हवालात ले जाते हैं, हम पेट बजाते आते हैं वो गाल बजाए जाते हैं...। रागेंद्र स्वरूप आडिटोरियम में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना रचित नाटक ‘हवालात’ के मंचन ने आजादी के वर्षों बाद भी रोटी-कपड़ा-मकान के लिए जूझ रहे शिक्षित बेरोजगारों की मन: स्थिति और आक्रोश को मंच पर सजीव कर दिया। सिपाही के रूप में नौकरीपेशा मध्य वर्ग की माली हालत, ओहदेदारों के दबाब में काम करने की बेचारगी अच्छे ढंग से दशाई गई। सम-सामयिक घटनाक्रमों पर करारी चोट थी।
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सवा घंटे लंबी नाट्य प्रस्तुति प्रयोगात्मक शैली में थी। बिना किसी इंटरवल के एक ही सेट और कास्ट्यूम में मंचन चलता रहा। नाटक में दिखाया गया कि ठंड से ठिठुरते, भूख से छटपटाते तीन बेरोजगारों को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए हवालात जाना ही एकमात्र विकल्प नजर आता है, जहां रोटी भी मिलेगी और कंबल भी। मंचन को रोचक और सजीव बनाने के लिए सेट पर पड़े कागज के टुकड़ों से आग जलाई गई।

युवक सिपाही के सामने खुद को जेबकतरा, हत्यारा और नक्सलाइट साबित करने का हर संभव जतन करते हैं। लक्ष्य जल्द से जल्द हवालात पहुंचना है। बेरोजगारों और सिपाही के बीच बातचीत करारा व्यंग थी। स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा की हकीकत को बखूबी उजागर किया गया। खादी और खाकी की पोल खोली।
बेरोजगार युवकों का सिपाही से यह पूछना- ‘अगर हम गाली देना सीख जाते तो क्या पुलिस में नौकरी मिल जाती’ पुलिसिया बर्ताव और समाज में उसकी घटती छवि की ओर इशारा था। भाव निरंतरता ने दर्शकों को बांधे रहे। सांस्कृतिक संस्था बैकस्टेज की इस प्रस्तुति का निर्देशन प्रवीण शेखर ने किया। मुख्य अतिथि केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा कि कारपोरेट जगत देश की बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान कर सकता है। अमर उजाला के क्लस्टर हेड भूपेंद्र दुबे ने मुख्य अतिथि व दर्शकों का स्वागत किया। यूनिट हेड भवानी शर्मा ने मुख्य अतिथि को प्रतीक चिन्ह व बुके भेंट कर सम्मानित किया।


पात्र परिचय:
प्रवीण शेखर निर्देशक
सतीश तिवारी बेरोजगार
नीरज उपाध्याय बेरोजगार
आशुतोष प्रताप सिंह बेरोजगार
सचिन चंद्रा हवलदार (गैंग्स ऑफ वासेपुर पार्ट 2 में भी अभिनय)
आशुतोष पांडे मंच सज्जा
राजकुमार लाइटिंग
संदीप यादव प्रोडक्शन कंट्रोलर
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प्रवीण शेखर का नया प्रोडक्शन ‘किस्सा तोता मैना’ है। शेखर के अनुसार जून में ही प्रोडक्शन पूरा हुआ है। पहला मंचन इलाहाबाद में हुआ। यह क्लासिक कहानियों को नए संदर्भ में पिरोने का प्रयास है। स्त्री-पुरुष के जटिल संबंधों को व्यापक पटल पर प्रस्तुत किया गया है। प्रवीण थिएटर और पत्रकारिता को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए कई विश्वविद्यालयों और कॉलेज में मास कम्युनिकेशन और थिएटर की गेस्ट फैकल्टी के रूप में जाते हैं।

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