जब नेता जी बोले, ‘वेरी गुड लक्ष्मी, नाइस सेलेक्शन’

Kanpur Updated Wed, 25 Jul 2012 12:00 PM IST
कानपुर। ‘बात जनवरी 1944 की है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस बर्मा आए थे। रंगून में अपने एक परिचित के यहां ठहरे थे। वहां जब हम उनसे मिलने पहुंचे तो चार लड़कियां और खड़ी थी। डॉ लक्ष्मी ने मेरा हाथ पकड़ा और अंदर ले गईं। नेताजी ने एक-दो मिनट इधर-उधर की बात की और बोले-कागज पर पढ़ने-लिखने से कुछ नहीं होगा, अमल करिए, तभी आजादी मिलेगी। कल से अपना काम शुरू कर दीजिए। फिर डॉ लक्ष्मी की तरफ देखकर, बोले-वेरी गुड लक्ष्मी, नाइस सेलेक्शन।’
आजाद हिंद फौज की लेफ्टीनेंट रहीं मानवती आर्या ने मंगलवार को अमर उजाला से पुरानी यादें ताजा कीं। अपनी कैप्टन डॉ लक्ष्मी सहगल के आखिरी दर्शन के लिए वह मेडिकल कालेज आईं थी। बोलीं-‘नेताजी डॉ लक्ष्मी की कबिलियत पर बड़ा भरोसा करते थे। डाक्टर साहब ने ही मुझे नेताजी से मिलवाया था।’ वह एक नजर में पहचान लेती थीं कि किस सीने में देशभक्ति की आग की चिंगारी है। रानी झांसी रेजीमेंट में एक-एक सदस्य को उन्होंने छांटकर भरती किया। इन ‘फौजियों’ को नेताजी ने एक ही नजर में ‘ओके’ कर दिया था।
रेजीमेंट की टुकड़ी रंगून से दूसरी जगह शिफ्ट हुई थी। दो-तीन बैग में डॉ लक्ष्मी का सामान आया था। उन्होंने सारा सामान गरीबों को बांट दिया। जो बिस्तर रेजीमेंट की दूसरी फौजियों को मिले थे, वही खुद भी लिए। ‘रेजीमेंट के गठन के पहले हम लोग इंडियन इंडिपेंडेंस लीग (आईआईएल) के सदस्य के रूप में काम करते थे। खासतौर पर भारत की स्थिति के संबंध में महिलाओं और बच्चों को समझाते थे। देशभक्ति की इस मुहिम को नेताजी के आने के बाद अभिव्यक्ति मिल गई।’
2 जुलाई 1943 को रानी झांसी रेजीमेंट के गठन के बाद से आरजी हुकूमत के वक्त तक नेताजी सुभाषचंद्र बोस आजाद हिंद फौज के विभिन्न मसलों की रणनीति पर डॉ लक्ष्मी से बात करते थे। आरजी हुकूमत में उन्हें मंत्री बनाया गया था। डॉ लक्ष्मी और उनकी साथी महिलाओं का हौसला देखकर नेताजी ने रानी झांसी रेजीमेंट के गठन की अनुमति दी थी। बाकायदा सबको गोली चलाने का प्रशिक्षण और 303 बोर की रायफल दी गई थी। फंड इकट्ठा करने के लिए ‘हम लोग एक जेवर पहन कर जाते।
भाषण के दौरान जेवर उतार कर रख देते कि जिसका देश गुलाम हो उसे गहना पहनने का हक नहीं है। दूसरी महिलाएं भी अपने जेवर उतार देतीं। इसे नेताजी को देते। गहने बेचकर फौज के लिए हथियार, कारतूस आदि खरीदे जाते।’ इस मेहनत से डॉ लक्ष्मी की अगुवाई में रेजीमेंट मजबूत की गई थी। अन्याय के खिलाफ यही जुझारूपन डॉ लक्ष्मी के मिजाज में आखिरी लम्हे तक बना रहा।

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