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द्रोण बोले बेधड़क, सबसे पहले सड़क

Kanpur Updated Sun, 08 Jul 2012 12:00 PM IST
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कानपुर। शहर के महापौर पद का चुनाव जीतने के बाद कैप्टन पंडित जगतवीर सिंह द्रोण ने वादा किया कि उनका सबसे पहला काम सड़कों को दुरुस्त करवाना होगा। शहर की सड़कें पैदल चलने लायक भी नहीं बची हैं इसलिए सबसे पहले इनपर काम कराया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि वे नगर निगम की आमदनी के स्रोत बढ़ाने का प्रयास करेंगे और शहर के विकास के लिए राज्य सरकार से भी हर संभव मदद मांगेंगे। सभी दलों से तालमेल बैठा कर शहर को तरक्की के रास्ते पर ले जाएंगे। अपने तीन बार के संसदीय कार्यकाल को याद कर उन्होंने कहा कि सांसद रहते हुए भी उन्होंने कानपुर के लिए बहुत कुछ किया था। जीतने के बाद ‘अमर उजाला’ ने उनसे बातचीत की।
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- प्रदेश में सपा की सरकार है। शहर के विकास के लिए धन कैसे लाएंगे? अफसरों से काम कैसे करवाएंगे?
- ऐसा नहीं होता है। जब कोई जनप्रतिनिधि अपनी बात को सही प्लेटफार्म पर सही समय रखता है तो उसे सहयोग मिलता है। सूबे के मुखिया युवा हैं और उनकी सोच विकास की है। रही बात अफसरों से काम कराने की तो टकराव की खातिर नहीं आए हैं। हमें तो विकास कराना है। मेलमिलाप से काम करवाएंगे। सरलकर का मसला भी प्रदेश सरकार से बात करके हल कराएंगे।

- आरोप है कि जीतने के बाद आप जनता के बीच से गायब हो जाते हैं?
- ऐसा नहीं है। जनता के बीच से गायब होने की छवि होती तो इसी शहर ने उन्हें क्यों जिताया होता।

-तीन बार संसदीय कार्यकाल के दौरान शहरियों के लिए क्या किया?
- एक उपलब्धि हो तो बताऊं। श्रमशक्ति एक्सप्रेस के अलावा गंगा बैराज को बनवाने का खाका सरकार के सामने रखा था। ये दीगर बात है कि ये उपलब्धियां किसी दूसरे जनप्रतिनिधि के कार्यकाल के दौरान मिलीं।

- आरोप है कि जनसमस्याओं के प्रति आपकी सजगता कम दिखती है
- ये समझ-समझ का फेर है। नगर निकाय, विधानसभा और लोकसभा, हर एक का अधिकार क्षेत्र बंधा होता है। सांसद जब गली-मोहल्ले की नाली खड़ंजा में व्यस्त हो जाएगा तो अन्य काम धरे रह जाएंगे। सांसद कार्यकाल के दौरान 40 फीसदी मसले केंद्र सरकार स्तर के, 30 फीसदी मसले राज्य स्तर के और बाकी मसले शहर के होते थे। ताकि देश से लेकर शहर तक की समस्याओं को उठाकर उनका निस्तारण कराया जा सके।

- लोकसभा चुनाव हारने के बाद जनहित में क्या किया?
- चुनाव हारने के बाद संगठन के बैनर तले उठाए जाने वाले हर मसले में मेरी सहभागिता शत-प्रतिशत रही। जनप्रतिनिधि हो या न हो, जनहित को ध्यान में रखना ध्येय है।

- जीत का श्रेय किसे देते हैं?
- संगठन से बड़ा कोई नहीं होता। भाजपा के हर छोटे-बड़े नेता एक मंच पर आ चुनाव में जुटे थे और इसका लाभ ये हुआ कि पार्टी को जीत हासिल हुईं। ये श्रेय संगठन के साथ जनता को है कि उसने अपना सही मताधिकार का प्रयोग किया है और इसका असर उसे दिखेगा।
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