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गैस भी अंदर, कैश भी अंदर, जनता रोती जाए

Kanpur Updated Thu, 14 Jun 2012 12:00 PM IST
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कानपुर। एजेंसी वालों का खेल है कि गैस भी अंदर, कैश भी अंदर। अंदर मतलब जेब में। शहर की 6 गैस एजेंसियों में सीबीआई की जांच-पड़ताल में यह खुलासा हुआ। बुधवार को सीबीआई ने दूसरे दिन भी गैस एजेंसियों में जांच जारी रखी। कई एजेंसियों से वाउचर उठाए और डिलीवरी मैन को साथ लेकर उपभोक्ताओं के घर पहुंच गए। छानबीन से खुलासा हुआ कि कई एजेंसियों में कागजों में तो गैस बांटी दिखाई गई लेकिन हकीकत में नहीं। इसकी कालाबाजारी करके रकम डकारी गई। एजेंसियों में यह धंधा सालों से चल रहा है। इसके अलावा सीबीआई ने होटलों, रेस्टोरेंट और अन्य प्रतिष्ठानों में भी छापे मारकर जांच की।
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सीबीआई ने परमपुरवा स्थित ओरियंटल गैस एजेंसी, के ब्लाक किदवईनगर में साक्षी गैस एजेंसी, बर्रा में ममता गैस एजेंसी, सत्य साईं गैस एजेंसी गुरुदेव पैलेस, कृष्णा साईं गैस एजेंसी विष्णुपुरी और अमित गैस एजेंसी कौशलपुरी में बुधवार को भी जांच-पड़ताल की। इन एजेंसियों से कुछ वाउचर उठाए और डिलीवरी मैन को साथ लेकर घरों में पहुंचे। सूत्रों की मानें तो कुछ घरों में पहुंचने पर खुलासा हुआ कि उन्हें सिलेंडर मिला ही नहीं और डिलीवरी दिखा दी गई। वाउचर का सीरियल नंबर भी मैच नहीं कर रहा था। सीबीआई की सभी 6 टीमों ने दोपहर से होटलों, रेस्टोरेंट, वेल्डिंग के कारखानों और अन्य प्रतिष्ठानों में भी छापे मारे। कुछ प्रतिष्ठानों में ब्लैक में लिए गए घरेलू गैस सिलेंडरों का प्रयोग होता मिला। कुछ जगहों पर पाया गया कि सिलेंडर तो व्यावसायिक था पर घरेलू सिलेंडरों से रिफलिंग कर काम हो रहा था।
शक की सुई डीएसओ दफ्तर की ओर भी
सूत्रों की मानें तो रसोई गैस की कालाबाजारी में शक की सुई डीएसओ दफ्तर पर भी है। सीबीआई को जानकारी दी गई है कि एजेंसी संचालक डीएसओ दफ्तर में हर माह चढ़ावा चढ़ाते हैं। माना जा रहा है कि सीबीआई यहां के स्टाफ से भी पूछताछ कर सकती है। उधर, डीएसओ दफ्तर में कालाबाजारी रोकने के लिए मारे गए छापे और रिपोर्ट दर्ज कराने का ब्योरा क्रमवार सजा लिया गया है। गैस एजेंसियों में अनियमितताओं पर ऑयल कंपनियों को भेजे गए पत्रों की फाइल भी निकाल ली हैं।



स्लग : अमर उजाला खोज-खबर

गोलमाल है भई सब गोलमाल है...
कानपुर। सीबीआई के छापों में रसोई गैस एजेंसियों में कई तरह की अनियमितताएं उजागर हुई हैं। इसका खुलासा तो जांच रिपोर्ट आने के बाद ही होगा। ‘अमर उजाला’ ने इस मामले की खोज-खबर की तो इसका खुलासा हुआ। पेश है तथ्यों समेत एक रिपोर्ट-

ये हैं कालाबाजारी के सबूत

सबूत 1- शहर में चाय, समोसे, मिठाई की दुकानें, होटल, रेस्टोरेंट और अन्य प्रतिष्ठानों की संख्या 75 हजार से अधिक है जबकि कामर्शियल कनेक्शन सिर्फ 13 हजार हैं। इससे सीधे साबित होता है कि बाकी के लोग घरेलू गैस सिलेंडर का प्रयोग कर रहे हैं। इन्हें घरेलू गैस सिलेंडर 300-400 रुपये ब्लैक में आसानी से मिल जाते हैं।

सबूत 2- रसोई गैस सिलेंडरों की आपूर्ति में इजाफा और कामर्शियल सिलेंडर में कमी कालाबाजारी की ओर साफ इशारा करती है। आईओसी ने मार्च में 9918, अप्रैल में 6858 और मई में 5651 कामर्शियल सिलेंडर की आपूर्ति की है। बीपीसी ने मार्च में 2961, अप्रैल में 2445, मई में 2395 और एचपी ने मार्च में 1631, अप्रैल में 1441, मई में 1018 कामर्शियल सिलेंडरों की आपूर्ति की।

इसलिए होती है कालाबाजारी
कामर्शियल सिलेंडर में 19 किलो गैस होती है। इसकी कीमत 1559.50 रुपये है। घरेलू गैस सिलेंडर में 14 किलो गैस का मूल्य 399 रुपये है। ऐसे में 1 किलो कामर्शियल रसोई गैस की कीमत 82 और घरेलू गैस की कीमत 28 रुपये है। इस तरह घरेलू गैस से व्यावसायिक गैस की कीमत 54 रुपये ज्यादा हुई। बस इसी मुनाफे के चक्कर में कालाबाजारी का धंधा पैर पसार रहा है।

कम आपूर्ति का बहाना
शहर में 687522 घरेलू गैस कनेक्शन हैं। हर माह एजेंसियों को 4.50 लाख घरेलू गैस सिलेंडर ही मिलते हैं। इस तरह 2.37 लाख घरेलू गैस सिलेंडर की कम आपूर्ति होती है। इस तरह 45 दिन में 1 सिलेंडर की आपूर्ति का औसत आता है। एजेंसी संचालक आपूर्ति में यही बहाना बनाते हुए कालाबाजारी करते हैं।

कैसे मानें ये तर्क
-हम मानते हैं कि कनेक्शनों के सापेक्ष 2.37 लाख कम सिलेंडर की आपूर्ति होती है पर यह भी तो सत्य है कि हर माह हर उपभोक्ता सिलेंडर नहीं लेता। छोटे परिवारों में एक सिलेंडर कम से कम डेढ़ से दो माह चलता है। डीएसओ दफ्तर भी हर किसी का सिलेंडर एक माह में खत्म न होने की बात से सहमत है।

-समय-समय पर कराई गई डीएसओ दफ्तर की जांच में खुलासा हुआ है कि व्यावसायिक उपभोक्ताओं ने महीनों से अपने कनेक्शन पर सिलेंडर नहीं लिया। एजेंसी संचालकों का तर्क होता है कि व्यावसायिक उपभोक्ता जिस एजेंसी का ग्राहक है उसी से सिलेंडर लेने को बाध्य नहीं है।

-ठीक है हम मान लेते हैं कि व्यावसायिक उपभोक्ता किसी भी एजेंसी से सिलेंडर ले सकता है। अगर एजेंसी संचालकों का तर्क मान लिया जाए तो किसी न किसी एजेंसी की आपूर्ति तो बढ़ेगी लेकिन ज्यादातर एजेंसी में ग्राहकों की तुलना में कामर्शियल सिलेंडर की आपूर्ति कम ही है।
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