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मां शहद सी मीठी लोरी सुनाती हैं...

Kanpur Updated Mon, 14 May 2012 12:00 PM IST
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कानपुर। मां एक ऐसा शब्द है, जिसमें ब्रह्मांड समाया है। ये मां ही तो है जो हमें थपकी देकर शहद सी मीठी लोरी सुनाती है, उंगली पकड़कर चलना सिखाती है, मुसीबतों और दुनियादारी की समझ बताती है। ये मां ही तो है, जो हमें चोट लगने पर खुद कराह जाती है और मरते-मरते भी औलाद को जीने की दुआ दे जाती है। मां के प्यार और दुलार को कुछ ऐसे ही शब्दों में पिरोकर बच्चों और बड़ों ने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया। मौका था ‘अमर उजाला’ कार्यालय में आयोजित ‘मदर्स डे’ सेलिब्रेशन का। कार्यक्रम में कानपुर शहर के अलावा फर्रुखाबाद, बांदा, बिल्हौर, उन्नाव, सचेंडी और घाटमपुर सहित कई जगह से आए बच्चों और बड़ो ने अपनी मां के लिए अपनी लिखी इतनी सुंदर कविताएं पढ़ीं कि सुनने वाले सुनते ही रह गए। वहीं, बच्चों ने अपनी मम्मियों को गीतों का तोहफा देते हुए उनके साथ केक भी काटा।
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इस सेलिब्रेशन के लिए ‘अमर उजाला’ ने पाठकों से मां को संबोधित कविताएं आमंत्रित की थीं। पाठकों से मिली 280 कविताओं में निर्णायकों की मौजूदगी में 12 लोगों ने अपनी कविताएं पढ़ीं। सबसे सुंदर कविता के लिए केके गर्ल्स कालेज के प्रवक्ता विजय कुमार गुप्ता को पहला, कक्षा आठ की छात्रा रीत दुबे (फर्रुखाबाद) को दूसरा और शारदा नगर निवासी अंकिता को तीसरा स्थान मिला। समारोह में सभी प्रतिभागियों को ‘अमर उजाला’ की ओर से गिफ्ट और प्रतियोगियों की लिखी कविताओं से सजे ग्रीटिंग कार्ड भेंट किए गए। समारोह में प्रतिभागियों और मेहमानों का स्वागत ‘अमर उजाला’ के महाप्रबंधक भवानी शर्मा और ‘अमर उजाला’ परिवार ने किया। हंसपुरम नौबस्ता से आए समाजसेवी डा. आरके मिश्रा ने पांच प्रतिभागियों को 101 रुपये का पुरस्कार भेंट किया। यह पुरस्कार मंगलवार को ‘अमर उजाला’ कार्यालय में प्रतिभागियों को उनकी तसवीरों के साथ दिया जाएगा।

मां को याद कर छलक पड़े आंसू
प्रतिभागी वैशाली ने मेरी मां.., अंकिता ने नन्हीं देह को जब तुमने हौले से अपनी बाहों में समेटा था.., आनंद फैजाबादी ने शब्दकोष है मेरा छोटा.. और अंशिका जायसवाल ने मां तुम होती तो न छूटता मेरा बचपन... कविता सुनाई। अगली कड़ी में प्रतिभागी कर्णिका ने ओ माई मदर.., सीमा त्रिवेदी ने मां तुम मेरी.., डा. अलका गुप्ता ने मां तुम मेरा..., विजय कुमार गुप्ता ने जिनकी मर जाती है मां... और रीत दुबे ने मैंने अपनी मां को बहुत दर्द सहते देखा है... कविता सुनाई तो लोग अपने आंसू नहीं रोक पाए। इनके अलावा नेहा वर्मा, आबरीना और आशीष की कविताएं भी मनभावन रहीं।

मम्मियों ने याद किया बचपन
सेलिब्रेशन में जहां बेटियों ने मां के लिए सुंदर कविताएं सुनाईं, वहीं उनकी माताओं ने भी अपने बचपन और मां को याद किया। बेटी वैशाली के साथ आईं प्रेम शीला ने अपनी मां फूलमती को मदर्स डे विश किया। अंकिता की मां प्रमिला तिवारी ने मां कमला शुक्ला के लिए ‘मेरी मां मेरी ममता’ कविता सुनाई। प्रतिभागी अंशिका की मां ऊषा जायसवाल ने अपनी मां सोनी देवी के लिए प्यार भरे शब्द कहे तो उनकी आंखें छलछला पड़ीं। नेहा की मां मालती वर्मा कुछ कहे बिना ही रो पड़ीं। रीत दुबे की मां रिंकी ने बेटी को कविता सुनाते समय अपने सीने से लगा लिया। वहीं, आबरीना की मां शमीमा और प्रतिभागी डा. अलका गुप्ता सहित सभी महिलाओं ने अपनी मां के लिए ‘तू कितनी अच्छी है तू कितनी भोली है प्यारी प्यारी है ओ मां...’ गीत गाया।

अनाथ बच्चों का दुख बयां किया
सेलिब्रेशन में अपनी मां के लिए सुंदर कविता रचने वाले बच्चों ने दुनिया की सारी माताओं को मदर्स डे की बधाई दी। इन नन्हे-मुन्नों ने जहां अनाथ बच्चों का दुख बयां किया, वहीं मां शब्द को ‘ये तो सच है कि भगवान है, धरती पे रूप मां-बाप का इस विधाता ही पहचान है...’ गीत से संवारा।

प्रथम विजेता
कब्र की आगोश में जब थक के सो जाती है मां,
तब कहीं जाकर थोड़ा सा सुकून पाती है मां,
फिक्र में बच्चों की कुछ ऐसे ही घुल जाती है मां,
नौजवां होते हुए भी बूढ़ी नजर आती है मां।

रूह के रिश्तों की ये गहराइयां तो देखिये,
चोट लगती है हमारे और चिल्लाती है मां,
कब जरूरत हो मेरे बच्चों को इतना सोचकर,
जागती रहती हैं आंखें और सो जाती है मां।

घर से परदेस जाता है कोई नूरे नजर,
हाथ में गीता लेकर दर पर आ जाती है मां,
जब परेशानी में घिर जाते हैं हम परदेस में,
आंसुओं को पोछने ख्वाबों में आ जाती है मां।

चाहे हम खुशियों में मां को भूल जायें दोस्तों,
जब मुसीबत सर पे आ जाये तो याद आती है मां,
लौटकर सफर से जब कभी आते हैं हम,
डाल कर बांहें गले में सर को सहलाती है मां।

हो नहीं सकता कभी अहसान उसका ये अदा,
मरते मरते भी दुआ जीने की दे जाती है मां,
मरते दम बच्चा न आ पाये अगर परदेस से,
अपनी दोनों पुतलियां चौखट पे रख जाती है मां।

प्यार कहते हैं किसे और ममता क्या चीज है,
ये तो उन बच्चों से पूछों, जिनकी मर जाती है मां।
-विजय कुमार गुप्ता
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द्वितीय विजेता

मैंने अपनी मां को बहुत दर्द सहते देखा है,
मुस्कुराती जिंदगी को बरबाद होते देखा है,
जिस उंगली को थाम कर (पापा की) मैं चलना सीखी,
एक दिन अपने पापा को खाक में मिलते देखा है।

जिस मां को देखा था मैंने दुल्हन जैसा सिंगार किए,
फिर एक दिन अपनी मां का सिंदूर उजड़ते देखा है,
धन्य है मेरी मां जो फिर मां-बाप दोनों बनकर मेरे साथ चली,
किया नहीं था काम जो मां ने वो काम करते देखा है।

हम बच्चों को खुश रखने की खातिर कभी नहीं जो रोती थी,
रात में सबके सो जाने पर उन्हें घंटों रोते देखा है,
भगवान आपसे क्या मांगूं सिर पर सदा ममता का हाथ रहे,
खुशियां दे दो सारी मेरी मां को, बस यही हमारी इच्छा है।
-रीत दुबे
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तृतीय विजेता
नन्हीं देह को जब तुमने हौले से अपनी बांहों में समेटा था,
मेरे साथ-साथ जन्म हुआ उस दिन मेरी मां का था
प्यार भरी आंखों ने जब मुझको निहारा था,
जिंदगी से भरी आंखों ने जब मुझको निहारा था,
आशा भरी उन आंखों में मिला मुझे जीने का सहारा था,
मेरे पहले कदमों को देखने के लिए शायद तुम सबसे ज्यादा तरसी थी,
मेरे घर आने पर, तेरी खुशी फूट फूट बरसी थी,
अपनी नींद गवां तुमने मुझको सुलाया था,
पर इतना करते हुए एहसान कभी न जतलाया था,
कलम पकड़ना, अक्षर बनाना सबसे पहले तुमने ही तो सिखलाया था,
घबराने पर धैर्यता का पाठ तुमने ही जतलाया था।,
परीक्षा के दिनों मुझसे ज्यादा कड़ी मेहनत तुम करती थी,
परीक्षा खतम होने पर, कागज की नाव बनाकर घुमाने कहीं ले जाती थी,
हर खुशी को हमेशा मुझ तक पहुंचाना चाहती थी,
तुम हमेशा कैसे यह सब कर पाती थी,
आज एक बेटी बन कर खड़ी हूं तेरे सामने,
हर मुसीबत, हर मुश्किल को अपनाने,
मेरे रहते कभी न तू पड़ेगी अकेली,
वायदा है तुझसे मेरा, मेरी सबसे प्यारी सहेली।
-अंकिता

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