चेस्ट हॉस्पिटल का वेस्ट कर रहा इंफेक्टेड

Kanpur Updated Tue, 06 May 2014 05:30 AM IST
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कानपुर। मुरारीलाल चेस्ट हॉस्पिटल के कचरे से आसपास रहने वालों कई लोगों की टीबी हो गई। तीन साल में पांच लोगों की मौत भी हो चुकी है। इसके बावजूद हॉस्पिटल प्रशासन न तो इस संक्रमित कचरे (हॉस्पिटल वेस्ट) को उठवा रहा है और न ही वहां कचरा फेंकना बंद करा रहा है। हालत यह है कि कार्डियोलॉजी के पीछे ग्राउंड में खेलते समय बच्चे कचरे में गेंद उठाने से कतराते हैं। आसपास रहने वाले डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ और उनके परिजन कचरे को लेकर चिंतित हैं।
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जीएसवीएम मेडिकल कालेज से संबद्ध मुरारी लाल चेस्ट अस्पताल (टीबी अस्पताल) का कचरा वर्षों से इसके बगल में कार्डियोलॉजी की ओर अक्सर फेंक दिया जाता है, पर वहां से इसे हटाया नहीं जाता। इस वजह से वहां कचरे के ढेर लग गए हैं। अस्पताल के गंदे पानी में कूड़ा बजबजाता रहता है। अस्पताल के पीछे कैंपस में रहने वाले आशीष ने ‘अमर उजाला’ को बताया कि इस कचरे से बदबू आती रहती है। इस वजह से आसपास खड़ा होना भी दूभर रहता है। कूड़ा कार्डियोलॉजी के पीछे स्थित मैदान तक फैलता रहता है। जैसे - तैसे हिम्मत करके वे इस ग्राउंड में क्रिकेट खेलते हैं। कोशिश रहती है कि कचरे की तरफ बाल न जाए, पर यदि चली जाती है तो वे उसे इस डर से उठाने नहीं जाते कि कहीं उन्हें भी टीबी का संक्रमण न हो जाए। अस्पताल प्रशासन से कई बार वहां रहने वालों ने वेस्ट न फिकवाने और डंप कचरा उठाने का आग्रह किया, पर उसे अनसुना कर दिया गया। 15 दिन पहले नगर निगम के माध्यम से एटूजेड के विनय दीक्षित से बात की तो वे कूड़ा उठाने को एक हजार रुपये मांगने लगे। रुपये न देने की वजह से उन्होंने भी कूड़ा नहीं उठवाया।
‘अमर उजाला’ ने इस सूचना पर मौके पर जाकर पड़ताल की। टीबी, कार्डियोलॉजी और संक्रामक रोग चिकित्सालय (आईडीएच) के पीछे मेडिकल कालेज कैंपस में रहने वाले राम, श्याम, मंदीप, शिवम, अजीत, विशाल आदि ने बताया कि इस कचरे की वजह से उन्हें भी टीबी होने का खतरा है। हवा चलने पर बदबू की वजह से घरों में भी सांस लेना दूभर हो जाता है। कैंपस में पता चला कि आईडीएच की पूर्व कर्मचारी फूलमती का बेटा बब्बन उर्फ अद्धा अस्वस्थ है, जबकि बब्बन के बेटे छोटे (25), राजन (23) और बेटी नन्ही बेटी (18) की पिछले दो साल में मृत्यु हो गई। तीनों को टीबी थी। हैलट में धोबी के पद पर तैनात लल्ला के भाई राजकुमार और गीता की बेटी कविता (18) की भी टीबी से मृत्यु हो चुकी है। जबकि आईडीएच के सफाई कर्मी सुरेंद्र के बेटे सुरेंद्र की पत्नी कुसुम, अपर इंडिया जच्चा - बच्चा अस्पताल में तैनात एक महिला कर्मचारी की दो पुत्रियों समेत 12 से ज्यादा लोगों को टीबी है। वे चुपचाप इलाज करा रहे हैं। जबकि कार्डियोलॉजी के वार्ड ब्वाय रामसूरत चौधरी के बेटे अशोक को टीबी हुई तो वह वहां से मकान छोड़कर चला गया।
मेडिकल कालेज के डेंटल सर्जन डॉ. अशरफ उल्ला, फार्माक्लॉजी विभाग के डॉ. अजय शर्मा, मेडिसिन विभाग के डॉ. विशाल गुप्ता आदि ने बताया कि गंदगी और सुअरों की वजह से घर से निकलना दूभर है। बच्चों के भी मैदान में साइकिल चलाने या खेलने के लिए जाने पर बीमारी की चपेट में आने की आशंका रहती है।

हॉस्पिटल वेस्ट उठाने को एमपीसीसी से कांट्रेक्ट है, हालांकि कांट्रेक्ट खत्म हो गया है। हमारे अस्पताल से ज्यादा कचरा कार्डियोलॉजी का निकलता है। एक बंद रिक्शा बनवाने का प्रस्ताव है। उस रिक्शे से कचरा हैलट ले जाकर इंसीनरेटर में जलवाया जाएगा।
डॉ. सुधीर चौधरी, हेड, टीबी एंड चेस्ट विभाग, जीएसवीएम मेडिकल कालेज
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