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आईडीएच में हो सकता है कार्डियोलॉजी का विस्तार

Kanpur Updated Sat, 09 Feb 2013 05:30 AM IST
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कानपुर। जीटी रोड पर रावतपुर के पास लक्ष्मीपत सिंघानिया हृदय रोग संस्थान और संक्रामक रोग अस्पताल अगल-बगल हैं। हृदय रोग संस्थान में व्यवस्था दुरुस्त होने के साथ डाक्टर भी मरीजों की सेवाभाव में लगे रहते हैं। यहां हमेशा क्षमता से अधिक मरीज रहते हैं। वहीं, दूसरी तरफ उतना ही बड़ा संक्रामक रोग अस्पताल (आईडीएच) है। इसकी क्षमता भी लगभग हृदय रोग संस्थान के बराबर है, पर मरीज यहां इक्का - दुक्का ही आते हैं। प्रस्ताव है कि आईडीएच को हैलट या किसी अन्य अस्पताल में शिफ्ट करके हृदय रोग संस्थान का विस्तार कर दिया जाए। इसका मरीजों को फायदा मिलेगा। मेडिकल कालेज प्रशासन भी इस पर सहमत है, पर विस्तार की फाइल सचिवालय की हजारों फाइलों के बीच डंप है।
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आईडीएच : कुत्तों का जमावड़ा, बेड खाली
1949 में बने आईडीएच अस्पताल में बेड खाली होने से स्टाफ आराम फरमाता रहता है। दिन में तो कुत्ते, बंदर आते - जाते रहते हैं। रात में इनका जमावड़ा रहता है। आसपास गंदगी फैली रहती है। इसमें भी लगभग कार्डियोलॉजी के बराबर जमीन है। 80 बेड के इस अस्पताल का जायजा लिया गया तो डिप्थीरिया, डायरिया, पीलिया, चिकनपॉक्स, रैबीज और स्वाइन फ्लू वार्डों में ताला लगा मिला। टिटनेस वार्ड में मात्र तीन मरीज भर्ती थे। कभी - कभी मरीज न होने की वजह से सभी वार्डों में ताला लग जाता है। यह स्थिति लगभग नौ - 10 साल से है। हैलट, बाल रोग चिकित्सालय समेत अन्य अस्पताल से डिप्थीरिया, स्वाइन फ्लू, पीलिया आदि के मरीज रिफर न होने की वजह से आईडीएच में तालाबंदी की नौबत है।


ये है आईडीएच में स्टाफ
एक चिकित्साधिकारी, एक मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, तीन सिस्टर, छह स्टाफ नर्स, सात स्वीपर, छह वार्ड ब्वाय, क्लर्क समेत अन्य स्टाफ। मेडिसिन विभाग से रोटेशन में तीन जूनियर डाक्टर भी मरीजों का इलाज करनेे आते हैं।

आईडीएच में दवाओं का बजट - 20 लाख रुपये।


कार्डियोलॉजी : क्षमता से ज्यादा मरीज
100 बेड वाले हृदय रोग संस्थान की ओपीडी में रोजाना 500 से 600 मरीज और इंडोर में 25 - 30 मरीज आते हैं। कॉर्डियोलॉजी में रोगियों की संख्या में लगभग 200 गुना इजाफा हुआ है। हृदय रोगियों की तादात बढ़ने और जगह की कमी होने से इस अस्पताल का विस्तार नहीं हो पा रहा है। इसके मद्देनजर छह साल पहले कार्डियोलॉजी के तत्कालीन निदेशक डा. ए दयाल ने आईडीएच की जमीन पर हृदय रोग संस्थान के विस्तार का प्रस्ताव शासन को भेजा था। जीएसवीएम मेडिकल कालेज प्रशासन ने भी इसके लिए हामी भरी, पर फाइल सचिवालय में जाकर धूल खा रही है। इसका खामियाजा हृदय रोगियों को भुगतना पड़ रहा है। इस बदलते मौसम में मरीज और भी ज्यादा आ रहे हैं। इमरजेंसी और आईसीसीयू में बेडों के अलावा विशेष ट्रालियों, स्ट्रेचर से लेकर व्हीलचेयर तक में इलाज करने के बावजूद सीमित संसाधनों की वजह से तमाम मरीजों को रोजाना निराश लौटना पड़ता है।




आईडीएच में दवाएं खरीदकर इलाज (तीमारदारों से बातचीत)
सास सुन्दारा देवी (65) दो फरवरी से टिटनेस वार्ड के बेड नंबर-4 पर भर्ती हैं। डाक्टर सुबह राउंड पर आते हैं। इलाज के नाम पर यहां से ग्लूकोज और एंटीबायोटिक इंजेक्शन लगाया जाता है। छह हजार रुपये के दो इंजेक्शनों समेत करीब 12000 रुपये की दवाएं बाहर से ला चुके हैं।
कुसमा देवी, वारसगवर (उन्नाव)

17 जनवरी को बेटे मुकेश (30) की बत्तीसी जाम होने लगी और शरीर अकड़ने लगा। उसे फतेहपुर जिला अस्पताल ले गए पर वहां भर्ती न कर उसे आईडीएच भेज दिया गया। तब से मुकेश बेड-8 पर भर्ती है। सुबह डा. अनूप शुक्ला राउंड पर आते हैं। रात में सन्नाटा हो जाता है।
संतोष कुमार, सिमौर (फतेहपुर)

बेटी शकीना (16) को पांच दिन पहले बांगरमऊ अस्पताल से यहां भेजा गया था। तब से वह इस अस्पताल के बेड-11 पर भर्ती है। यहां कुछ दवाएं मिलती हैं। कभी-कभी दुकान से भी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। आराम नहीं मिल रहा।
जरीना, कईंस, बांगरमऊ (उन्नाव)

अन्य अस्पतालों से पीलिया, डायरिया आदि के मरीज रिफर नहीं किए जा रहे। मैं रोज राउंड करता हूं। वार्डों में भर्ती मरीजों को देखने के साथ ही इमरजेंसी में आने वाले मरीजों का ट्रीटमेंट किया जाता है। अस्पताल में दवाओं की कमी नहीं है। सभी मरीजों को दवाएं दी जा रही हैं।
डा. अनूप शुक्ला, प्रभारी चिकित्साधिकारी, आईडीएच


बयान

हम चाहते हैं कि कॉर्डियोलॉजी का विस्तार हो, इसमें बेड बढ़ें। आईडीएच का यूज बहुत कम हो रहा है। पूर्व में इसकी जमीन कॉर्डियोलॉजी को देने का प्रस्ताव बना था। शायद जमीन को लेकर कोई विवाद है। इसे दिखाया जाएगा। यदि विवाद है तो उसे निपटाकर कार्डियोलॉजी के विस्तार में सहयोग किया जाएगा।
डा. नवनीत कुमार, प्रिंसिपल, जीएसवीएम मेडिकल कालेज

यदि आईडीएच की जमीन मिल जाए तो वहां आउटडोर हास्पिटल बना दें। इससे मौजूदा हास्पिटल में मरीजों का प्रेशर कम होगा। इंडोर मरीजों में संक्रमण की आशंका खत्म हो जाएगी। इसका फायदा कानपुर के साथ विभिन्न जिलों से आने वाले हृदय रोगियों को मिलेगा। इस संबंध में मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल से बातचीत करने के साथ शासन स्तर पर भी पुन: प्रयास किया जाएगा।
डा. विनय कृष्णा, निदेशक, कार्डियोलॉजी

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