‘नदियां रो रहीं, खेती खो रही, सरकारें सो रहीं’

Kanpur Updated Sun, 09 Dec 2012 05:30 AM IST
कानपुर। ‘गंगा, कोसी, गंडक, महानंदा, वरुणा सहित 22 नदियों का पानी प्रदूषित हो चुका है। इन नदियों से जुडे़ हजारों गांवों में पीने के पानी का संकट खड़ा हो गया है। सिंचाई के लिए भी पर्याप्त पानी नहीं है। इन नदियों के पानी में फ्लोराइड, आर्सेनिक, आयरन की निर्धारित से ज्यादा मात्रा पाई गई है और इन नदियों का पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) भी गड़बड़ा गया है। जीवन दायनी इन नदियों में पर्यावरण असंतुलन के लिये जिम्मेदार देश की जीडीपी आधारित अर्थव्यवस्था है जो उद्योगों के विस्तार की चिंता तो करती है लेकिन उद्योगों से होने वाले प्रदूषण पर मौन साधे बैठी है। यही कारण है कि कृषि प्रधान अपने देश के तीन राज्यों के 820 गांवों के किसानों का मानना है कि यदि उनके पास कोई अन्य विकल्प हो तो वे किसानी छोड़ सकते हैं’। ये बातें पर्यावरणविद पद्मश्री अनिल प्रकाश जोशी ने पत्रकारों से बातचीत में कही।
पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिये 20 नवम्बर से सिलीगुडी से साइकिल यात्रा पर निकला उनका 11 सदस्यीय दल शनिवार को ग्रीनपार्क स्टेडियम में पहुंचा। इस मौके पर उन्होंने केन्द्र और प्रदेश सरकारों से जीडीपी की तर्ज पर सकल पर्यावरण उत्पाद सूचकांक तैयार करवाने की मांग की। उन्होंने बताया कि साइकिल यात्रा के दौरान उनकी टीम ने पश्चिम बंगाल, बिहार, यूपी के 820 गांवों में पानी, जंगल, मिट्टी की स्थिति देखी और वहां के किसानों से बातचीत की। किसानों ने कहा कि किसानों और किसानी के प्रति सरकारों के रवैये के कारण उनकी भावी पीढ़ी खेती-किसानी नहीं करना चाहती। खेती किसानी को वह सम्मानजनक भी नहीं मानते। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल, बिहार, उप्र, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़ सहित 9 राज्यों से गुजर कर उनकी साइकिल यात्रा 2500 किलोमीटर की यात्रा करके दिसम्बर के अंत में देहारादून में पहुंचेगी। इस दौरान 70 जिलों के 3000 से अधिक गांवों में वहां की पानी, मिट्टी, जंगल की स्थिति का सर्वे किया जाएगा। सर्वे रिपोर्ट 9 राज्यों के मुख्यमंत्री, सभी राजनीतिक दलों और केन्द्र सरकार को सौंपी जाएगी। उनके दल में 18 वर्ष की छात्रा रेनु सकलानी (बीकॉम द्वितीय वर्ष), छात्रा रजना कुकरेती (बीकॉम ), दयाराम नौटियाल (72 वर्ष किसान), द्वारिका प्रसाद सेमवाल, मनमोहन नेगी, विनोद खाती, सत्यपाल रमोल, दीपक चौधरी, सतेन्द्र पवार, पाल सिंह शामिल हैं। साइकिल यात्रा शहर में शनिवार को रुकने के बाद रविवार को कन्नौज के लिये रवाना होगी।


घाघ की कहावत अब बदल गई
कानपुर। अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है। जहां 6.50 लाख गंाव बसते हैं लेकिन गांवों की स्थिति बेहद खराब है। जीडीपी आधारित अर्थव्यवस्था ने कृषि प्रधान देश के किसानों को ही मुसीबत में डाल दिया है। यही कारण है कि अब कवि घाघ की कहावत ‘उत्तम खेती, मध्यम बान, नीच चाकरी भीख समान’ बदल कर ‘मध्यम चाकरी, उत्तम बान, नीच किसानी भीख समान’ हो गई है।

बदल रहा है बिहार
कानपुर। तीन राज्यों से चलकर आई साइकिल यात्रा के अनुभव बताते हुये पर्यावरणविद अनिल जोशी ने बताया कि बिहार में यात्रा के दौरान लोगों से बातचीत में पता चला कि बिहार अब भय मुक्त हो रहा है। सड़कें बेहतर हो रही हैं। विकास भी दिखाई दे रहा है। लेकिन यूपी में इलाहाबाद से कानपुर तक कई जगह सड़कें खराब मिलीं।


देश के गांवों का यह सच भी बताया

-820 गांवों के 100 फीसदी किसान खेती छोड़ने को तैयार
-99.9 फीसदी किसान नहीं चाहते कि उनकी भावी पीढ़ी किसानी करे
-खेती करने में सम्मान नहीं
-खाद्यान्न का उत्पादन करते हैं लेकिन इसका मूल्य नहीं तय कर पाते हैं।
-उद्योग लगाने के लिये एक बार लेना पड़ता है कर्ज, लेकिन किसान बार-बार लेते हैं कर्ज
-फतेहपुर के अम्बेपुर गंाव और कौशांबी के अधारपुर गांव में 70 परिवारों पर एक नलकूप है
-इन दोनों गांवों के किसानों के पास राशन कार्ड तक नहीं है
-सांसद, विधायकों को गांव में आने से मना करते हैं किसान
-गांवों में खत्म हो रही मिट्टी, पहले 30 रुपये में आती थी एक ट्राली, अब एक हजार रुपये में आती है।

अनिल जोशी को मिले अवार्ड
-जवाहरलाल नेहरू अवार्ड 1999
-सामाजिक विज्ञान पुरस्कार 2000
-मैन ऑफ दि ईयर 2002
-पदमश्री 2006

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