‘ऐसे हिन्दुस्तान में क्यों लौटें’

Kanpur Updated Sun, 25 Nov 2012 12:00 PM IST
कानपुर। ‘अरे तेरे सिर के बाल चले गए सुरेश...तेरे भी कहां बचे हैं उदय’, अपनी हेल्थ देख पहले, पहले तो बड़ा दुबला था, लगता है अमेरिका का पानी रास आ गया..’। कुछ इसी तरह की चुहलबाजी सुनने देखने को मिली आईआईटी में जहां एलमनाई में 1962 बैच के पुराने यार इकट्ठा हुए। सालों बाद एक-दूसरे को देखकर आंखों में 1962 का नजारा तैर गया। बगिया में बैठे यार पुरानी यादें ताजा करते रहे। खाना खाया और सबके परिवारवालों से मिले। विदेश से आए कई आईआईटियंस ने भारत की व्यवस्थाओं में बदहाली पर अफसोस जाहिर कर कहा कि यहां हर जगह मनमानी, लालफीताशाही, तानाशाही आदि की वजह से लौट कर आने का मन नहीं करता। आईआईटी घूमने के बाद आईआईटीयंस ने डायरेक्टर एक्सचेंज प्रोग्राम चलाने की बात कही। ताकि विदेशों में रहने वाले आईआईटियंस अपने एक्सपीयरेंस आकर शेयर कर सकें। आईआईटी की 3 दिवसीय एल्यूमिनाई मीट रविवार को खत्म होगी।

क्लाइमेट और लाल फीताशाही रोकता है भारत आने को
अमेरिका से आए सूरज रावल कहते हैं कि भारत का क्लाइमेट और लालफीताशाही यहां आने से रोकती है। इसके अलावा अमेरिका में शिक्षा का स्तर भारत के मुकाबले काफी बेहतर है। यहां भ्रष्टाचार और शिक्षकों का उदासीन रवैया शिक्षा के स्तर को गिरा रहा है। वहां गए तो अच्छी नौकरी और पैसा मिलने लगा फिर परिवार सेटेल हो गया, उसके बाद देश आने की हिम्मत टूट गई।


मोनोपोली छोड़ें एफडीआई
अमेरिका से आए रवि खन्ना कहते हैं कि एफडीआई ठीक है। लेकिन अगर वॉल मार्ट अपनी मोनोपोली छोड़कर यहां के छोटे व्यापारियों के साथ पार्टनरशिप करे तो बेहतर होगा। कोडक में 33 साल काम करने वाले रवि कहते हैं कि भारत मेें तानाशाही ज्यादा होने के कारण कोई इंडस्ट्री पनप नहीं पाती। कोई इंडस्ट्री बंद करने की बात करता है तो कोई चालू करने पर एक मत नहीं है।

शिक्षा का स्तर सुधारें
बंगलुरु से आए उदय बोस कहते हैं कि सरकार शिक्षा की जिम्मेदारी पंचायती स्तर पर दे दे। तभी सुधार संभव है। प्राइमरी शिक्षा जब तक मजबूत नहीं होगी, नींव कमजोर होती चली जायेगी। देश की शिक्षा का हाल विदेशों के मुकाबले तो काफी बुरा है।

सैंडी ने डरा दिया
न्यू जर्सी से आए गोपाल गुप्ता कहते है कि सैंडी तूफान ने हालत खराब कर दी थी। लग रहा था कि अब चत्मकार ही बचा सकता है। तापमान 40 डिग्री हो गया था। बिजली चली गई थी। तीन दिन और तीन रात बहुत परेशानी हुई। पेट्रोल और गैस मिलने में करीब एक महीने तक दिक्कत हुई। लेकिन वहां के मौसम विभाग ने बेहतर काम किया जो समय समय पर सही जानकारी देता रहा। उन्होंने देश की मेट्रो सेवा की तारीफ की।

अब टूटने पर चूर चूर नहीं होगा ग्लास
ओकोहामा स्टेट यूनिवर्सिटी आफ सिनसिनेटी में काम कर रहे राज नारायण सिंह सिलिकॉन कार्बिल कंपोजिट पर रिसर्च कर रहे हैं। यह अगर सफल हो जाता तो ग्लास गिरने पर टूटेगा ना ही चूर-चूर होगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे कंडे गिरने पर टूटते नहीं है वैसे ही हाल ग्लास का होगा।

चला शायरी का दौर
अपने साथियों के साथ बैठे सुरेश अग्रवाल मस्ती के मूड में दिखे। जल चुका है हुस्न का हुक्का...ये तो हम हैं जो इसे गुड़गुड़ाए रखे है...शायरी सुनकर सभी हंस दिए। कई और साथियों ने भी हंसगुल्ले शेयर किए।

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