‘अल्लाह हुम्मा लब्बैक’ से गूंजी मीना की फिजा

Kanpur Updated Thu, 25 Oct 2012 12:00 PM IST
मेराज अहमद
मीना (मक्का शरीफ)। अल्लाह हुम्मा लब्बैक (ऐ अल्लाह, हाजिर हूं) से मीना की फिजाएं गूंज रही हैं। हम लोगों के दिलो-दिमाग की कैफियत सूफी शायर असगर गोंडवी के इस शेर ‘अब न कोई निगाह है और न कोई निगाह में, महव खड़ा हुआ हूं मैं हुस्न की जलवागाह में’, की तरजुमानी हो गई है। इस शेर में असगर ने अल्लाह की मोहब्बत, जिसे इश्क हकीकी कहते हैं, में डूबे बंदे के जज्ब का हाल बयान किया है।
आज (बुधवार) हज का पहला दिन है। मंगलवार शाम सऊदी अरब समय के मुताबिक करीब 7.30 बजे मक्का शरीफ से चलकर आठ किलोमीटर दूर मुकद्दस मीना करीब साढ़े आठ बजे पहुंच गए। जिधर निगाह डालते हैं खेमों का एक लंबा सिलसिला नजर आता है। हमारा खेमा नंबर 106 है।
मंगलवार रात नफिल की नमाजें अदा करते हुए गुजरी है। कुछ देर के लिए आंख झपकी फिर फजिर का वक्त आ गया। इसके साथ ही लब्बैक की सदाएं हर तरफ गूंजनें लगीं। जेहन पर अजब रूहानी खुमारी तारी है। सारी दुनिया के लोग इकट्ठा हैं, न कोई छोटा लगता है और न कोई बड़ा। सब अपने हैं। कायनात में हर तरफ-‘अल्लाह-हू, अल्लाह-हू’।
हमारे साथ मसजिद रेल बाजार के पेश इमाम मौलाना सलमान हैं। इसी खेमे में मछली बाजार के सादिक कमाल हैं। नदवा लखनऊ में मुदर्रिस मुफ्ती जैद भी हम लोगों के साथ ही हैं। अभी कुछ देर पहले नाश्ते का पैकेट मिला है। इसमें जूस, नमकीन, मीठे बिस्कुट और कई आइटम है। हर खेमे के पास चाय के केन रखे हैं। जम-जम का वाटर कूलर रखा हुआ है।
हज कमेटी ने शिनाख्ती कार्ड दिया था। सऊदी सरकार ने एक कार्ड और दिया है। इसमें नाम, पता, मोबाइल नंबर समेत पूरा डीटेल है। मंगलवार देर रात तक बगल के खेमे की एक खातून बहुत बीमार हो गई थीं। उन्हें फौरन एंबुलेंस से ले जाकर आईसीयू में भरती कराया गया। अब ठीक हैं। खेमे में लौट आई हैं। खेमे में बैठे बातें करते दोपहर हो गई। जोहर की अजान हो रही है। आपसे बताया था कि दिलो-दिमाग अजब कैफ में है। लगता है दुनियावी आपाधापी बेकार है। नमाज पढ़ो और अपने रब की याद में गर्क रहो। यह लुत्फ और किसी चीज में नहीं आ सकता है। मीना में हज का बुधवार का दिन खेमों में इबादत करते गुजरा है। गुरुवार को अराफात- मजदलफा का सफर शुरू होगा।

हज 2012 मंगलवार से शुरू हो गया है। हज मुबारक। हममें कुछ खुशकिस्मत हैं जो इस साल के हज में शरीक हो रहे हैं। लेकिन बहुत से हजरात हैं, जिनकी तमन्ना अभी पूरी नहीं हुई। कोई बात नहीं, उदास न हों, मायूसी कुफ्र है, पाक परवरदिगार अगली बार या फिर उसके बाद बुलाएगा। खाना-ए-काबा तक पहुंचने के इस सफर का ब्योरा खास आप तक पहुंचाने के लिए ‘अमर उजाला’ ने सफर-ए-हज-2012 शृंखला शुरू की है, जो खाना-ए-काबा के तवाफ और तीन शैतानों को आखिरी मरतबा कंकड़ी मारने तक जारी रहेगी। सरकारी अफसर सैयद मोहम्मद इकबाल, मेराज अहमद और ‘अमर उजाला’ के कई हमदर्द इस बार हजयात्रा में हैं। जो कुछ भी हज में हो रहा है, वे हमें बता रहे हैं। हम हू-ब-हू आपके लिए पेश कर रहे हैं। इसे पढ़ें और तसव्वुर करें कि जिस्मानी न सही, जेहनी तौर पर आप भी हज में हैं।


हमारा इरादा बेहद नेक है। हम इसलाम के रुक्न हज की अहमियत हर आम और खास तक पहुंचाना चाहते हैं। इस कोशिश में हम से कोई चूक भी हो सकती है, उसके लिए हम पहले से ही माजरत ख्वा हैं। किसी को इसमें कोई खामी नजर आती है या फिर ये कोशिश पसंद आती है तो जज्बात का इजहार करने के लिए जरूर डायल करें 9675898214

(सफर-ए-हज 2012- एक)



(लोकल कोट)

जब पहली बार खाना-ए-काबा पर नजर पड़ी थी तो लगा जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी मिल गई। मुंह से बेसाख्ता यही दुआ निकली कि ऐ परवरदिगार! बार-बार यहां हाजिरी की मौका मिले।
-डॉ सैयद सुल्तान हाशमी, पूर्व सदस्य राज्य हज कमेटी

जब मक्का शरीफ में दाखिल हुए तो लगा कि जिंदगी कामयाब हो गई। बहुत देर तक खाना-ए-काबा को देखते रहे। ‘अल्लाह का घर’ सामने था, आंखों से आंसू छलक पड़े। दिल चाहा कि बस यहीं रुक जाएं।
-हाजी मोहम्मद सलीस, जनरल सेक्रे टरी सुन्नी उलेमा कौंसिल


-हज की लाइव रिपोर्ट पढ़कर निगाहों के सामने जैसे फिल्म चलने लगी
अकील शानू, बाबूपुरवा

-सफर-ए-हज मुझे और मेरे परिवार को पढ़कर बहुत अच्छा लगा।
मोहम्मद साजिद, दवा प्रतिनिधि, किदवईनगर

-सफर-ए-हज पढ़ते-पढ़ते वहां का सीन निगाहों के सामने आ गया।
अब्दुल सलाम जाफरी, विजयनगर

मेरा मदीना में कारोबार है। कुछ दिन के लिए घर आया हूं। हज का सटीक सीन खींचा है।
-मोहम्मद अयाज, चमनगंज

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प्रस्तुति: रजा शास्त्री
विशेष सहयोग: शारिक अल्वी

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