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पुल बनबैवे की कही हती, अबै लौ नाहीं बनो

kannauj Updated Sun, 14 Apr 2019 12:01 AM IST
नदी से निकलकर स्कूल जाते बच्चे।
नदी से निकलकर स्कूल जाते बच्चे। - फोटो : amarujala
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 इंदरगढ़ के खनियापुर और सकरवारा से लगे करीब एक दर्जन गांव के लोग सालों से ईशन नदी पर एक पुल के लिए तरस रहे हैं। चुनाव के समय गांव पहुंचे नेताओं को लोग पुराने वादे याद दिलाते हैं, हर बार की तरह जवाब होता, इस बार जिता दो, पुल बनवा देंगे। सालों से हो रहा यह वादा, अभी तक वादा ही है।  बच्चे ईशन नदी को पैदल और टायर ट्यूब की मदद से पार करते हैं। गांव के अन्य लोगों को लंबा चक्कर लगाकर करीब आठ किमी दूर स्थित पुल से होकर इंदरगढ़ कस्बा पहुंचना पड़ता है। मुसीबतें तमाम हैं, निदान किसी का नहीं है। इस चुनाव की बाबत कुछ भी पूछने पर लोग फट पड़ते हैं, पुल बनबैवे की कही हती, अबै लौ नाहीं बनो। का करैं नेतन कौ।
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नदी के दूसरी तरफ स्थित माध्यमिक विद्यालय के बच्चे जान जोखिम में डालकर नदी पार कर स्कूल जा रहे हैं। इनकी खासी तादाद है। यह अधिकतर 6 से 12 साल तक के हैं। बच्चे पढ़ाई के लिए जान खतरे में डाल रहे हैं। नेताओं ने हर चुनाव में इन्हें छला है। पुल की मांग पूरी नहीं हुई। खनियापुर व सकरवारा समेत करीब एक दर्जन गांव के ग्रामीणों ने ईशन नदी के किनारे प्रदर्शन किया।  फूल श्री कहती हैं, नेता वोट मांगन आउत हैं। अबै लौ पुल नाहीं बनो, जौ बच्चा ढंग से पढ़ पावैं...। कोई सुनन वालो नाहीं हैं, लोग चाहे जीयें, चाहे मरैं। बताया कि गांव से करीब एक सैकड़ा से अधिक बच्चे नदी पार कर पढ़ाई करने जाते हैं। गांव से कुछ ग्रामीण नदी किनारे खड़े होकर बच्चों को टायरों पर बैठाकर नदी पार कराते हैं। इसके लिए बच्चों के अभिभावकों की बदल-बदल ड्यूटी लगती है। गांव वाले विकास की बाट जोह रहे हैं। नेता हर चुनाव में आते हैं, बड़े-बड़े वादे करते हैं, फिर चुनाव के बाद मुड़कर नहीं देखते हैं।  हर चुनाव में ग्रामीणों की सिर्फ एक ही मांग रहती है, उनके गांव में सिर्फ 100 मीटर लंबा पुल खनियापुर व सकरवारा के बीच बनवा दिया जाए। जिससे गांव के हालात सुधर जाएं, बाजार को महिलाएं और पुरुष जा पाएं, और बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल सके।

बरसात में फसल होती बर्बाद
ऊषा देवी, माया देवी, लज्जा देवी, राजेश कुमारी, अनीता व श्यामा ने बताया कि सकरपुर्वा के ग्रामीणों के खेत नदी पार गांवों में हैं। कुछ की खेती इस पार है। गांव में जीविका के दो ही मुख्य साधन हैं, खेती और पशु। जब बाढ़ आती है तो नदी पार नहीं जा सकते। पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था नहीं हो पाती है। किसान कर्ज तले दबते चले जाते हैं। मजदूर काम के लिए नदी पार नहीं जा पाते हैं। लोगों के सामने जीविका की समस्याएं खड़ी हो जाती हैं।

दो माह तक बच्चों की पढ़ाई रहती ठप
श्रीकृष्ण व विजय बहादुर समेत ग्रामीण बताते हैं, बरसात में ईशन ऊफान पर होती है। तब करीब दो माह तक बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह ठप हो जाती है। टायर से बच्चों को नदी पा नहीं कराई जा सकती। ऐसे में पढ़ाई प्रभावित होती है।

न नेता ध्यान दे रहे, न प्रशासन
 ग्रामीणों के मुताबिक वह लोग कई वर्षों से जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों से गांव में स्कूल व नदी पर पुल की मांग कर रहे हैं। हुआ कुछ नहीं। अब दो ही उपाय है...या तो बच्चों को पढ़ाई से महरूम रखें या उनकी जान जोखिम में डालकर उन्हें स्कूल भेजें।

पुल बनने से कई गांवों की परेशानी होगी दूर
 छह हजार ग्रामीणों की परेशानी पुल से दूर हो सकती है। गांव के राजेश, श्रीप्रकाश, रामेश्वर कहते हैं,खनियापुर से सकरवारा के बीच पुल बन जाए तो कई गांव के लोगों की समस्या दूर होगी। लोगों को रोजमर्रा के सामान के लिए इंदरगढ़ के बाजार जाना पड़ता है। यह नदी के दूसरी तरफ है। इससे लोगों को परेशानी होती है।


20 गांव हैं प्रभावित
 लाल सहायपुर्वा, बगुलआई, सकरवारा, सलेमपुर, ताहपुर, सुताह, तिलक सराय, मढ़पुरा, महाद्वौरा, नंदेनगला, खनियापुर, तिज्जापुर्वा, महमूदपुर, किशनपुर वसंत, भगवंतापुर, सैय्यापुर, गपचरियापुर, विषैनैपुर्वा, अर्जुनपुर आदि गांव प्रभावित हैं।

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