जंग-ए-आजादी में कलम के सिपाही भी कूदे थे

Kannauj Updated Sat, 11 Aug 2012 12:00 PM IST
कन्नौज। गुलामी की जंजीरों से हिंदुस्तान को आजाद कराने के लिए अहिंसा, आक्रामकता के साथ ही लेखनी भी हथियार बनी। वीर रस से भरे गीत-संगीत की धुन काने में पड़ते ही किसी की बांह फड़फड़ा उठती थी तो कोई सिर पर कफन बांध मरने-मिटने के लिए निकल पड़ता था।
साहित्यकार, कवि और लेखक डा. मदन तिवारी बताते हैं कि 1930 से 1942 तक के आजादी के आंदोलन के दौरान कवि/साहित्य प्रेमी रामदयाल तिवारी, कन्हैयालाल, भारत सिंह, हजूरी सिंह की जोड़ियों के गीत गांव-गली में गूंजते थे। पंडित यज्ञदत्त तिवारी, बाबू प्रयाग नारायण श्रीवास्तव के व्याख्यान नौजवानों के साथ ही महिलाओं और बूढ़ों की रगों में देश प्रेम की भावना जगाते रहे। प्रेमनरायण तिवारी (मंत्री आजाद), इच्छालाल शर्मा की कविताएं सुनाते हुए अंगरेजों के दांत खट्टे करने के लिए क्रांतिवीर निकल पड़ते थे।
राजनरायण मिश्र के लिखे व खेले नाटकों के जरिए अंगरेजी हुकूमत के जुल्म और ज्यादती की जीवंत दास्तां लोगों को दिखाई गई। सूरज प्रसाद तिवारी मकरंदनगर द्वारा दारोगा के अभिनय, शिवनारायण उर्फ वंदेमातरम के सैन्य संगठन और बिगुल वादन के बीच नाटक देखकर दिलों में देश की खातिर लड़ने-मरने की भावनाएं हिलोरे मारने लगती थीं। कालिका प्रसाद भंडारी, दयाराम और बाबा कोमलदास ने शिविर सेवा के जरिए अंगरेजों के खिलाफ कन्नौजवासियों को मोरचा खोलने के लिए प्रेरित किया।
डायमंड जुबली हाईस्कूल से रामदयाल दीक्षित, मौलवी विलायत हुसैन ने टीचरी से इस्तीफा दिया। मुंशी रघुराज सिंह ने आनरेरी मुंसिफी, महेशदत्त मिश्र ने वकालत छोड़ दी। विश्वेश्वर प्रसाद टीचर पद से, जबकि विंदा प्रसाद भट्टाचार्य, जैनुल आवदीन फारुखी, हरीनारायण टंडन आदि विद्यार्थी स्कूल से निकाले गए। वृजनारायण सक्सेना, श्यामलाल, सेठ वासुदेव, सेठ चंद्रगुप्त आदि नवयुवकों ने वानर सेना बनाकर आंदोलन के लिए घर-घर जाकर अनाज और पैसा संग्रह कर योगदान दिया।

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