मनरेगा : तीन माह में 414 लाख रुपए ही खर्च हो सके

Kannauj Updated Sun, 08 Jul 2012 12:00 PM IST
कन्नौज। कार्यदाई संस्थाओं और ग्राम पंचायतों ने शायद मनरेगा के काम तेजी से न कराने की कसम खा ली है। यही वजह है कि बीते साल प्रदेश के दस फिसड्डी जिलों में शामिल इस जिले में इस साल भी मनरेगा की रफ्तार काफी धीमी है। 12 महीनों का लक्ष्य 6392 लाख रुपए है, लेकिन शुरुआती तीन महीने में मात्र 414 लाख रुपयों का ही काम कराया जा सका है। यह तो लक्ष्य के सापेक्ष दस फीसदी भी नहीं है।
मनरेगा की बेहाल कहानी सरकारी आंकड़ों की जुबानी शासन तक भेज दी गई है। 30 जून तक भेजी गई प्रगति रिपोर्ट के अनुसार विकास खंड कन्नौज में 62, जलालाबाद में 17, गुगरापुर में 16, तालग्राम में 37, छिबरामऊ में 57, सौरिख में 43, हसेरन में 42, उमर्दा में 75 लाख रुपये के ही विकास कार्य कराए जा सके हैं। कार्यदाई संस्थाएं मात्र 58 लाख रुपया ही विकास कार्यों पर खर्च कर सकी हैं। जिले में ऐसा कोई ब्लाक नहीं है, जहां पर लक्ष्य को पूरा किया जा सका हो।
विभागीय सूत्रों की मानें तो ज्यादातर ग्राम पंचायतों में प्रधानों और सचिवों के बीच तालमेल की कमी है। कभी प्रधान काम के वक्त नजर नहीं आते हैं तो कभी सचिवों का अतापता नहीं रहता है। संविदा कर्मियों को भी समय से मानदेय न मिल पाना मनरेगा के काम में सुस्ती की मुख्य वजह है। दैनिक दिनचर्या में आर्थिक तंगी झेल रहे रोजगार सेवक बेमन से काम कराते हैं। इस कारण काम की गति तेज नहीं हो पा रही है।
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जिले में 24 करोड़ रुपया उपलब्ध है
कन्नौज। मनरेगा में बजट की भरमार है। यदि अधिकारी और कर्मचारी काम कराना चाहें तो रुपया खूब है। लेकिन पता नहीं क्यों वे मनरेगा के धन का उपयोग कर जनकल्याणकारी कार्य कराने के लिए रुचि नहीं ले रहे हैं। इससे अफसरों की नीति और नीयत दोनों शक के दायरे में आ रही हैं।
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चुनाव बाद मनरेगा का ही नंबर
कन्नौज। जिला प्रशासन ने मनरेगा की गति तेज करने के लिए सख्ती के संकेत दिए हैं। निकाय चुनाव होने के बाद लापरवाही बरतने वालों की नकेल कसी जाएगी। अपर जिलाधिकारी रमेश चंद्र यादव कहते हैं कि वीवीआईपी जिले में अन्य विकास कार्यों की तरह मनरेगा की रफ्तार भी तेज करने के लिए जो करना होगा, किया जाएगा। काम न करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी।
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बीडीओ कागजी घोड़े दौड़े रहे
कन्नौज। ग्रामीणों की मानें तो मनरेगा में तेजी आने की उम्मीद करना बेमतलब है क्योंकि जिले के ज्यादातर बीडीओ गांवों का भ्रमण करने से कतरा रहे हैं। दफ्तरों में बैठकर निर्देश देने तक ही बीडीओ सीमित हैं। कागजी घोड़ों से काम भी कागज की फाइलों तक ही सीमित हो गया है। स्थलीय निरीक्षण न होने से जमीनी हकीकत से बीडीओ अनजान हैं। जिला प्रशासन भी सुस्ती बरतने वाले बीडीओ पर कार्रवाई करने के बजाय अनदेखी करके मनरेगा का बेड़ा गर्क करने में जुटा है।
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ब्लाक उपलब्ध रुपया
कन्नौज 218 लाख
जलालाबाद 129 लाख
गुगरापुर 60 लाख
तालग्राम 218 लाख
छिबरामऊ 403 लाख
सौरिख 164 लाख
हसेरन 166 लाख
उमर्दा 327 लाख

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