सद्गुरू की संगत से दूर होते दुख

Kannauj Updated Tue, 06 May 2014 05:30 AM IST
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छिबरामऊ (कन्नौज)। पूर्वी बाईपास स्थित संत निरंकारी भवन में आयोजित सत्संग में प्रवचन करते हुए महात्मा सुशीलबाबू ने कहा संत हो या सन्यासी, ज्ञानी हो या अज्ञानी, दुख सभी के जीवन में आता है। फर्क इतना है ज्ञानी अपने ज्ञान का सहारा लेकर दुख से मुक्ति पा लेता है जबकि अज्ञानी को दुख निपटा देता है। केवल सद्गुरू की संगत से ही दुख दूर हो सकते हैं।
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उन्होंने कहा सद्गुरू का स्मरण करते रहने से संत कभी दुखी नहीं होते। इसी तरह जब हम सद्गुरू की शरण में होते हैं तब दुख हमसे कोसों दूर रहता है। जब हम परमात्मा रूपी सद्गुरू को भूल जाते हैं तब हमें दुख घेर लेते हैं। दुनिया में अमीर हो या गरीब समस्या सभी के सामने है। गरीब की समस्या है भूख लगे तो क्या खाए और अमीर की समस्या है क्या खाए जो भूख लगे। मानव जितना प्रेम रूपए से करता है उतना प्रभू से नहीं करता इसीलिए उसके मन में भटकाव रहता है। उन्होने कहा संत कुछ मांगने नहीं बल्कि कुछ देने आते हैं। संतों का आना सौभाग्य की बात होती है क्योंकि वह तो बहती नदी के जल की भांति होते हैं जिनका न तो कोई ठिकाना होता है और न ही कोई बेगाना होता है। महात्मा राजकुमार गुप्ता के संचालन में हुए कार्यक्रम में रंजना शाक्य, सोनी वर्मा, पारूल, सुरभि, विमला, नरेशचंद्र वर्मा, गंगादीन, मुन्नालाल, रामरहीस व हरिश्चंद्र ने भी अपने भजनों व विचारों से संगत को निहाल किया।
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