फोटो 03 केएनजेपी-17 शीतगृह में आलू की छंटाई करते पल्लेदार व किसान।

Kanpur Bureau Updated Tue, 03 Oct 2017 11:55 PM IST
फोटो 03 केएनजेपी-17 शीतगृह में आलू की छंटाई करते पल्लेदार व किसान।


आलू बेल्ट में किसान फिर अपनी बेबसी पर आंसू बहा रहा है। शीतगृह में भंडारित आलू का भाव माटी के मोल पहुंच गया है। आलू के लगातार गिर रहे दामों को देख शीतगृह स्वामियों को अपना किराया वसूल पाना मुश्किल लग रहा है।

भाव में उछाल न आया तो इस बार किसानों को जबरदस्त घाटा होने की आशंका है। जिले में संचालित 111 शीतगृहों से तीन अक्तूबर तक महज 44 फीसदी आलू की निकासी हुई है। हालात अगर इसी तरह बने रहे तो एक बार फिर किसानों को आलू शीतगृह में ही छोड़ने को मजबूर होना पड़ेगा।

आलू किसान के लिए ज्यादा उत्पादन फिर घाटे का सौदा साबित हो रहा है। दूसरे प्रदेशों में आलू की खपत घटने से आलू के भाव में किसी तरह का उछाल नहीं आ रहा। इस बार आलू की खुदाई के दौरान भाव में एक बार कुछ उछाल आया था, लेकिन उसके बाद से किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं हुई।

बेल्ट में खाने में सबसे अधिक चिप्सोना आलू का प्रयोग होता है। इस प्रजाति के आलू के भाव औंधे मुंह गिरे हुए हैं। अगर किसान शीतगृह में भंडारित आलू को निकालता है तो उसे प्रति पैकेट 50 से 100 रुपये की बचत हो रही है। सफेद आलू के एक पैकेट (50 किलो) पर 50 रुपये की बचत हो रही है। सीड्स आलू का कोई भाव ही नहीं है। सुगर रहित चिप्सोना आलू के एक पैकेट पर 125 से 150 रुपये की बचत हो रही है।
प्रगतिशील किसान योगेंद्र सिंह का कहना है कि इस बार आलू का भाव शुरुआत से गिरा रहा। कहा कि पैदावार का रकबा बढ़ा है। आलू की मांग दूसरे प्रदेशों में कम होती जा रही है। पहले तमाम ऐसे क्षेत्र थे, जहां पर आलू की पैदावार नहीं होती थी। किसानों की जागरूकता का असर यह है कि अब शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां पर आलू की पैदावार नहीं होती हो।
जलालाबाद क्षेत्र के जगतपुर गांव निवासी रामसनेही, सुरेश कटियार, अशोक कटियार, राममिलन, राजेश, संजीव, आशुतोष दुबे का कहना है कि यदि एक माह के अंदर भाव में तेजी न आई तो किसानों के सामने आलू शीतगृहों में छोड़ने का अलावा कोई विकल्प नहीं रहेगा। उन्होंने सरकार से इस दिशा में कारगर कदम उठाने की मांग की।


किसान संघर्ष समिति के प्रदेश अध्यक्ष गीतेंद्र यादव का कहना है कि सरकार को आलू किसानों की दशा पर सरकार को विचार करना चाहिए। आलू की खपत के बारे में जब तक सरकार कोई ठोस निर्णय नहीं लेगी, हर साल ऐसे ही हालात पैदा होते रहेंगे। सरकार ऐसी नीतियां बनाए कि निजी उद्योगों में आलू की खपत हो सके।

कन्नौज-
दूसरे प्रदेशों में आलू की खपत घटने से गिरे दाम
शीतगृहों से आलू की निकासी महज 44 फीसदी

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