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दो साल बाद ली ‘अंगड़ाई’, काम तो आई

Jhansi Bureauझांसी ब्यूरो Updated Wed, 26 Jun 2019 12:54 AM IST
सुभाषगंज में  बैकप क्लीनर पद्दती से  नगर निगम की सुपर सटर मशीन ने नालों की सफाई की। अमर उजाला
सुभाषगंज में बैकप क्लीनर पद्दती से नगर निगम की सुपर सटर मशीन ने नालों की सफाई की। अमर उजाला - फोटो : REPORTERS
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झांसी। नालों की सफाई के लिए नगर निगम द्वारा दो साल पहले ढाई करोड़ रुपये की लागत से खरीदी सुपर सकर मशीन पहली बार काम आई। इसका उपयोग सुभाष गंज के नालों को साफ करने में किया गया। सूत्रों के अनुसार यह मशीन अधिकारियों के बीच खींचतान के चलते ताले में बंद थी। चंद मिनटों के अंदर नाला साफ करने वाली इस मशीन का उपयोग देख सभी आश्चर्य में दिखे। वे पूछ रहे थे कि इतनी उपयोगी मशीन का अब तक नगर निगम उपयोग क्यों नहीं कर रहा था?
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चंद मिनटों में कई फुट नाले की कई टन सिल्ट को साफ करने की क्षमता रखने वाली सुपर सकर मशीन का उपयोग अगर नगर निगम करता तो शायद आज बरसात में नालों की सफाई का इंतजार नहीं करना पड़ता। इसका अंदाजा इसकी कार्य क्षमता को देखकर लगाया जा सकता है। सुभाषगंज के नालों की सफाई के लिए पहुंची उक्त मशीन को जब उपयोग में लिया तो चंद मिनटों के अंदर नाले को कई फुट दूर तक एक ही स्थान पर खड़े रहकर साफ कर दिया गया। इस मशीन की खासियत यह है कि नाले पर कितना भी अतिक्रमण हो बस एक छोटा सा छेद कर उसका हॉज (सिल्ट खींचने वाला पाइप) कई फुट तक सिल्ट को खींचने का काम करने में सक्षम है। यह मशीन एक स्थान पर रहकर तकरीबन 25 फुट तक नाले को साफ कर सकती है।
बता दें कि शहर के 227 नाले (207 फुट से कम चौड़े तथा 20 नाले चार फुट से बड़े) को साफ कराने का काम हो रहा है। जहां 207 नाले नगर स्वास्थ्य अधिकारी सफाई कर्मचारियों और नाला गैंग के माध्यम से करा रहे हैं। दूसरी ओर 20 बड़े नाले 1.12 करोड़ की लागत से ठेकेदारों के माध्यम से साफ कराए जा रहे हैं।
अब तक शहर के सब नाले साफ हो जाते!
बिजौली में रखी यह मशीन की धूल हटाकर शहर मे जब लाई गई और उसका उपयोग हुआ तो देखने वालों की भीड़ लग गई। यह मशीन लोगों के लिए कौतूहल बनी रही। जब मशीन ने काम करना शुरू किया तो सभी ने नगर निगम के अधिकारियों और नाले सफाई के लिए टेंडर को लेकर सवाल खड़े किए। लोगों ने कहा कि करोड़ों की मशीन का उपयोग करने के लिए आचार संहिता से कोई लेना देना नहीं था। अगर विभाग चाहता तो इसे मई में ही शहर में उतार देते तो शहर का एक-एक नाला साफ हो जाता। दूसरी ओर जनता के 1.12 करोड़ रुपये बर्बाद नहीं होता।
क्या हैं फायदे?
- एक स्थान पर खड़े रहकर 25 फुट तक कर सकती है सफाई।
- एक बार में कई टन सिल्ट एकत्र करने की क्षमता।
- अतिक्रमण वाले स्थान पर आसानी से कर सकती है सफाई
- सिल्ट फैलने का झंझट नहीं।
- छह से आठ घंटे में चार से पांच किलोमीटर के नाले को कर सकती है साफ
इसमें पीडीएफ लगाएं
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कई सवालों के बाद आई नजर
25 मई को अमर उजाला ने ‘कमाल है, ढाई करोड़ की मशीन नहीं चली ढाई मील’ शीर्षक से खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था, जिसके बाद पार्षदों ने भी सदन की बैठक में इस मशीन को लेकर सवाल खड़े किए थे। उसका जवाब किसी के पास नहीं था। मशीन को लेकर महापौर से लेकर इंजीनियर और तत्कालीन नगर स्वास्थ्य अधिकारी ने तमाम तरीके के बहाने बनाए थे और अंत में बताया था कि मशीन खराब है। लेकिन, सूत्रों की मानें तो यह मशीन खराब नहीं हुई थी। बल्कि, विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत के कारण इसे उपयोग में नहीं लिया जा रहा था।
नाला सफाई में हर साल होता है खेल
जिस प्रकार से नालों की सफाई के लिए निर्माण विभाग 1.12 करोड़ रुपये व्यय कर नाला सफाई कर रहा है। उसी प्रकार से बीते कई सालों से यह प्रथा चली आ रही है। हर साल नाले की सफाई को लेकर जारी होने वाले टेंडर में खेल होता है। जहां तक नजर पहुंचती है वहां-वहां के नाले को साफ करा दिया जाता है। जबकि, अधिकांश हिस्से साफ ही नहीं किए जाते थे। अंत में स्थिति यह होती थी कि जगह-जगह बरसात में जलभराव हो जाता था। बावजूद, ठेकेदार को पाई-पाई चुका दी जाती थी।
मशीन को उपयोग में लिया जाएगा। पहली बार इस मशीन से कई फुट सफाई कराई गई है। इसे फिलहाल सफाई के उपयाग में रोज लिया जाएगा। - सुधीर कुलश्रेष्ठ, नगर स्वास्थ्य अधिकारी
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