पृथ्वी का उद्भव, बनावट व विकास पर हुई चर्चा

Jhansi Updated Sun, 24 Nov 2013 05:45 AM IST
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झांसी। प्रयोग व खोज के लिए तीन एच को ध्यान में रखना चाहिए। हेड यानी दिमाग से काम करना, हर्ट यानी दिल से निर्णय लेना और ऑनेस्टी यानी ईमानदारी से शोध कार्य पूरा करना। नेशनल सेंटर फॉर एक्सपेरिमेंटल माइनरोलॉजी एंड पेट्रोलॉजी के संस्थापक निदेशक प्रो. आलोक गुप्ता ने यह सलाह बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में दी। शनिवार से अर्थ साइंसेज विभाग में प्रीकेम्ब्रियन कांटिनेंटल ग्रोथ एंड टेक्टोनिज्म विषय पर तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में पृथ्वी के उद्भव, निर्माण, संरचना, विकास व खनिज संपदा आदि विषयों पर डेढ़ दर्जन से ज्यादा वैज्ञानिकों ने शोध पत्र पढे़।
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परिसर में आयोजित कांफ्रेंस में बतौर मुख्य अतिथि प्रो. आलोक ने कहा कि अभी भी भारत के अलावा तमाम देशों में प्राकृतिक तत्वों पर बहुत कम शोध हुए हैं। शोध कार्य खोज एवं प्रयोगों को बढ़ावा देते हैं। शोध कार्य को और ज्यादा व्यापक बनाने की जरूरत है। कुलपति प्रोफेसर अविनाश चंद्र पांडेय ने कहा कि क्षेत्र में जाकर काम करने के साथ ही प्रयोगशाला में प्रयोग पर भी समान जोर रहना चाहिए। एमजीकेवी विश्वविद्यालय, वाराणसी के प्रो. अवध राम ने कहा कि शोध कार्य में सत्यता एवं पारदर्शिता बहुत जरूरी है। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के भूतपूर्व वरिष्ठ डिप्टी डायरेक्टर एम राम कृष्णन ने क्षेत्र में घूम घूम कर काम करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि गूगल से खोज कर शोध पत्र पूरा करने वाले अच्छे वैज्ञानिक नहीं बन सकते हैं। कार्यक्रम का संचालन प्रो. रामचंद्र ने किया।
प्रथम तकनीकी सत्र में प्रो. ए बी राय ने भारत के उद्भव एवं विकास में आने वाले उतार चढ़ाव को शोध पत्र के माध्यम से समझाया। रूस के ए आई स्लोवानोव ने फेनोस्कैंडियन, साउर्थन अफ्रीका एवं भारत की भौगोलिक बनावट की प्रक्रिया का शोध पत्र पढ़ा। हैदराबाद के डा. सी मानिक्यंबा ने धारवा क्षेत्र के विकास एवं खनिज संपदा की उपलब्धि की जानकारी दी। हैदराबाद, एनजीआरआई के के एस वी सुब्रमण्यम ने आंध्र प्रदेश में पत्थरों के रासायनिक अध्ययन के निष्कर्ष को बताया। के के शर्मा एवं आर पुरोहित ने भारत के उत्तरी- पश्चिमी भूभाग के बनावट एवं उसकी प्रक्रिया को विस्तार से समझाया।
द्वितीय तकनीकी सत्र में रूस के विक्टर बलागेंसी एवं ए आई स्लानोव ने बाल्टिक भू भाग के उद्भव, विकास एवं बनावट की प्रक्रिया को पावर प्रजेंटेशन के माध्यम से शोधार्थियों के समक्ष प्रस्तुत किया। हृदय चौहान ने अरावती पर्वत श्रृंखला के पवर्तों में मिलने वाले रासायनिक तत्वों एवं पत्थरों के उम्र की जानकारी दी। तनवी गुप्ता ने शोध पत्र के माध्यम से भारत में हो रही हीरे की खोज एवं शोध के दौरान उपलब्ध परेशानियों को विस्तार से बताया। राजेश कुमार श्रीवास्तव एवं गुलाब सी गौतम ने महाकौशल क्षेत्र में ग्रेनाइट एवं दूसरे खनिज पदार्थों के खोज की स्थिति पर विस्तार से प्रकाश डाला। राजेश कुमार ने पूर्वी धारवार क्षेत्र में काले पत्थर की खोज एवं उसकी उपयोगिता की जानकारी दी। आर ए सिंह ने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ क्षेत्र के उद्भव, पहाड़ों की बनावट एवं विकास को विस्तार से समझाया। एम श्रीनिवास एवं बी निंगेह ने आंध्र प्रदेश के मेडक जिले में नरसापुर क्षेत्र में पचास करोड़ साल पूर्व क्षेत्र की बनावट एवं बदलाव की प्रक्रिया का शोध पत्र प्रस्तुत किया।
तृतीय तकनीकी सत्र में मैक्सिको के सुंदरम पी वर्मा ने पत्थरों के वर्गीकरण की नई प्रक्रिया एवं अंतर्राष्ट्रीय मानकों की जानकारी दी। मैक्सिको के संजीत कुमार वर्मा ने ब्राजील के उद्भव एवं विकास में पृथ्वी की आंतरिक बनावट एवं उथल पुथल को पावर प्रजेंटेशन से समझाया। नागपुर के वी पी मालवीय ने बुंदेलखंड क्षेत्र में पाए जाने वाले रसायनिक पदार्थों एवं शोध व खोज की वर्तमान दशा पर प्रकाश डाला। मैसूर विश्वविद्यालय के ए जी उगारकर ने धारवार क्षेत्र में पाए जाने वाले रासायनिक पदार्थों की स्थिति एवं उनकी मात्रा आदि पर प्रकाश डाला। सुमित कुमार मित्रा ने मेघालय में पठारों के निर्माण एवं यहां पाए जाने वाले पेड़ पौधों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर प्रो. एस पी सिंह, डा. एम एम सिंह, डा. संदीप आर्य, प्रो. पी जे रत्नाकर, डा. वी के सिंह, डा. बी सी जोशी, डा. एस सी भट्ट आदि उपस्थित रहे।
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