सत्रह करोड़ में पूरी हुई तीन करोड़ की योजना

Jhansi Updated Fri, 19 Oct 2012 12:00 PM IST
झांसी। रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों के आगमन को सुगम बनाने के लिए रूट रिले इंटरलाकिंग की योजना को पूरा होने में ग्यारह साल लग गए। शुरुआत में इस योजना की लागत तीन करोड़ रुपये तय की गई थी, जो समय के साथ बढ़ते बढ़ते सत्रह करोड़ पर पहुंच गई। दरअसल, यह योजना रेलवे के अपने ही विभागों के बीच तालमेल की कमी से घिसट- घिसट कर मुकाम तक पहुंच पाई।
बृहस्पतिवार को रेलवे स्टेशन पर रूट रिले सिस्टम का कार्य लगभग पूरा कर लिया गया है। इस योजना पर काम वर्ष 2001 में झांसी रेलवे स्टेशन पर गाड़ियों की बढ़ती संख्या, शंटिंग में लगने वाले समय व कर्मचारियों पर काम का दबाव कम करने के लिए शुरू किया गया था। उस समय तीन साल में पूरी होने वाली इस योजना की लागत लगभग तीन करोड़ रुपये तय हुई थी। आरआरआई व्यवस्था के लिए भवन निर्माण की व्यवस्था रेलवे के सिविल इंजीनियरिंग विभाग, विद्युत व्यवस्था इलेक्ट्रिक विभाग व पैनल तकनीक की व्यवस्था सिगनल एवं टेलीकाम विभाग द्वारा की जानी थी। इन व्यवस्थाओं को संरक्षा एवं परिचालन विभाग द्वारा तालमेल बिठाकर प्रयोग में लाना था, किंतु विभागों के बीच आपसी तालमेल का शुरू से ही अभाव रहा। सिविल इंजीनियरिंग विभाग के अफसरों ने युद्ध स्तर पर कार्य कर आठ साल पहले ही पुलिया नम्बर नौ स्थित कच्चे पुल के निकट आरआरआई केबिन की बिल्डिंग बनाकर तैयार कर दी थी। हालांकि, निर्माण के दौरान ही विद्युत विभाग को भवन में अंडर ग्राउंड लाइन बिछाने का काम करना था, लेकिन तब उसने ऐसा नहीं किया। भवन बनने के बाद अंडर ग्राउंड लाइन बिछाने के लिए तोड़फोड़ शुरू कर दी। जब बिजली लगी तो सिग्नल एवं टेलीकॉम विभाग ने अपनी व्यवस्था पैनल यंत्र स्थापित करने के लिए नहीं बनाई। यानी, इन तीनों विभागों ने शुरू से इस योजना में एकला चलो रे की तर्ज पर काम किया, लिहाजा योजना पूरी होने में ग्यारह वर्ष लग गए।

पैनल रूम को लेकर भी उठे सवाल
झांसी। आरआरआई बिल्डिंग में बनाए गए पैनल रूम को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। इसका डिजाइन बनाते वक्त इस बात का ख्याल नहीं रखा गया कि ट्रेनों के संचालन में नजर रखने के लिए इस रूम की महत्वपूर्ण भूमिका है। पिछले माह आरआरआई बिल्डिंग का जायजा लेने आए एनसीआर के महाप्रबंधक आलोक जौहरी ने भी कम जगह में बनाए गए पैनल रूम पर असंतोष जाहिर किया था। उनका कहना था कि ट्रेनों के मूवमेंट का सारा काम पैनल रूम में बैठकर होना है। इसके बाद भी यहां जगह की कमी रखी गई। कमरे में कांच तो लगे हैं, लेकिन उससे यार्ड स्पष्ट रूप से नहीं दिख रहा है। बिल्डिंग में बने अन्य छोटे कमरों को देखकर भी उन्होंने असंतोष जताया था।

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