ऐतिहासिक पंचकुइयां मेले में सज गई दुकानें

Jhansi Updated Wed, 17 Oct 2012 12:00 PM IST
झांसी। पंचकुइयां में लगने वाले ऐतिहासिक नवरात्र मेले में एक बार फिर दुकानें सज गई हैं। दशहरा तक यहां अच्छी ग्राहकी होगी। गृहस्थी से लेकर श्रृंगार का पूरा सामान यहां उपलब्ध है। दुकानदारों की मानें तो जैसे- जैसे पर्व समापन की ओर बढ़ेगा, वैसे- वैसे मेले में ग्राहकों की भीड़ बढ़ेगी। आखिरी के दो तीन- दिन में ही मां की कृपा से दुकानदारों की झोली भर जाएगी।
मां शीतला मंदिर पंचकुइयां में लगने वाले मेले की शुरूआत की तिथि तो निश्चित नहीं है, लेकिन माना जाता है कि करीब डेढ़ सौ साल से मेला लग रहा है। पहले यहां भले ही गिनी चुनी दुकानें आती हों, पर अब इनकी संख्या काफी बढ़ गई है। इस बार करीब दो सौ दुकानें मेले में आई हैं। इसमें गृहस्थी के उपयोग की वस्तुएं जैसे कप प्लेट, बर्तन, कड़ाही आदि से लेकर खेल खिलौने, श्रृंगार का सामान, पत्थर की मूर्तियां, मिट्टी के बर्तन के साथ- साथ मनोरंजन के लिए झूले, खाने पीने के सामान की दुकानें शामिल हैं। आज भी महिलाएं कड़ाही, कप प्लेट आदि खरीदने के लिए मेले का इंतजार करती हैं। यहां हर छह माह में मेला लगता है, लेकिन भीड़ में कमी नहीं आती है।
मूर्तिकार बाबूलाल की उम्र 80 वर्ष से ऊपर हो चुकी है, लेकिन मेले के प्रति उनका उत्साह आज भी जवानी जैसा ही है। उन्होंने बताया कि पत्थर की मूर्तियों का काम उनके पिताजी भवानी प्रसाद करते थे। 90 साल से अधिक समय से उनकी दुकान मेले में आ रही है। पिताजी के बाद उन्होंने काम संभाल लिया और अब उनका हाथ बेटा राजेश कुमार बंटाता है। बाबूलाल बताते हैं कि मेले में 40-50 साल पहले जो बात थी, वह नहीं रही। पहले पूरी रात दुकानें खुली रहती थीं और ग्राहकोें की लाइन लगी रहती थी। उस समय बिजली भी नहीं थी, लेकिन चोरी बदमाशी का कोई डर नहीं था।
चीनी मिट्टी के बर्तन और कप प्लेट के कारोबारी इकबाल भाई की दुकान भी मेले में 50 साल से अधिक समय से आ रही है। उन्होंने बताया कि महंगाई के कारण अब दुकानदारी में पहले जैसा मुनाफा नहीं रहा। पहले भले ही बिक्री कम होती थी, लेकिन खर्चे कम होने के कारण मुनाफा दिखाई देता था। अब ऐसा नहीं है। छह महीने में ही चीनी मिट्टी के आइटमों पर एक से लेकर पांच रुपये प्रति पीस की महंगाई आ गई है।
मां की चुनरी और प्रसाद की दुकान लगाने वाले बड़ा बाजार निवासी संजय गुप्ता ने बताया कि पहले उनके पिताजी मुन्ना लाल दुकान लगाते थे। अब दुकानें बहुत ज्यादा हो गई हैं। ग्राहक भी बढ़े हैं, लेकिन कंपटीशन के कारण आमदनी घट गई है। उनका कहना था कि सप्तमी से मेला उठता है और नवमी तक ही अच्छी खासी बिक्री हो जाती है।
बिंदी आदि श्रृंगार के सामान की दुकान चलाने वाली श्रीमती रेखा के पिताजी पहले दुकान लगाते थे। करीब बीस साल से रेखा और उनके पति मेले में आ रहे हैं। रेखा ने बताया कि शुरू के दो- तीन दिन तो सन्नाटा रहता है, लेकिन चौथ से दुकानदारी चलने लगती है। मेले में आने वाली अधिकांश महिलाएं श्रृंगार का कोई न कोई सामान खरीदती हैं, जिससे दुकानदारी चलती रहती है।
माता- पिता के साथ आने वाले बच्चों के लिए भी मेले में खेल- खिलौनों की पर्याप्त दुकानें लगी हैं। दुकानदार शाहिद ने बताया कि वह पांच- छह साल से मेले में आ रहे हैं। इस बार महंगाई का असर ज्यादा है। जो गुड़िया दस रुपये की बिकती थी, इस बार वह बीस रुपये की हो गई है। ऐसे में ग्राहक को संतुष्ट करने में काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। फिर भी वह निराश नहीं हैं। उनका कहना है कि मेला में अच्छी ग्राहकी हो जाती है।
सिंदूर विक्रेता अनीस भी मेले के पुराने दुकानदार हैं। करीब पचास साल पहले उनके पिताजी ने यहां दुकान लगानी शुरू की थी। वह बताते हैं कि पहले सिर्फ उन्हीं की दुकान आती थी, लेकिन धीरे- धीरे दुकानों की संख्या बढ़ गई। हालांकि, इसके साथ ग्राहकी भी बढ़ी है। लेकिन, इस बार महंगाई का जोर ज्यादा है। इसलिए मुनाफा बहुत कम निकलेगा।

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