घाटा देख एंबुलेंस संचालकों ने खड़े किए हाथ0

Jhansi Updated Wed, 17 Oct 2012 12:00 PM IST
झांसी। जिले में जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम को मानो ग्रहण लगा हुआ है। महज एक सप्ताह के भीतर ही यह योजना यहां पटरी से उतरती दिख रही है। एंबुलेंस संचालकों ने इसे घाटे का सौदा बता कर मरीजों को घर तक छोड़ने पर हाथ खड़े कर दिए हैं। इसे देखते हुए अब स्वास्थ्य विभाग के आला अफसर समस्या निस्तारण में जुट गए हैं।
गौरतलब है कि शासन की यह महत्वाकांक्षी योजना पूरे प्रदेश में तकरीबन एक साल पहले लागू कर दी गई थी। तब यहां भी इसे शुरू करने की तैयारी थी, लेकिन वाहन चयन में गड़बड़ी को देखते हुए ऐन मौके पर तत्कालीन जिलाधिकारी ने उद्घाटन से मना कर दिया था। इसके बाद कई बार वाहनों के लिए निविदा आमंत्रित की गई, लेकिन वाहन संचालक इसके लिए आगे नहीं आऐ। प्रावधानों में फेरबदल के बाद बीते 10 अक्तूबर को जिले में इस योजना की शुरुआत हुई थी।
जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम अन्य केंद्रों पर तो अभी चल रहा है, लेकिन महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कालेज में शुरुआत में ही लड़खड़ाता दिख रहा है। सर्विस प्रोवाइडरों की मानें तो मेडिकल कालेज में एंबुलेंस का संचालन घाटे का सौदा साबित हो रहा है। यहां पर प्रतिदिन आधा दर्जन प्रसव होते हैं। इसमें से पचास प्रतिशत प्रसूताएं दूर दराज के इलाकों की होतीं हैं। खासतौर से यहां पर टीकमगढ़, छतरपुर, पृथ्वीपुर, निवाड़ी, पन्ना, शिवपुरी, करेरा, दतिया आदि से महिलाएं प्रसव के लिए आतीं हैं। एक लाभार्थी को भी छोड़ने में पांच से छह घंटे का समय जाया होता है। एंबुलेंस की औसत माइलेज दस किलोमीटर प्रति लीटर है। अगर एक एंबुलेंस किसी भी लाभार्थी को मेडिकल कालेज से आवास विकास या शहर के आखिरी छोर पर स्थित किसी कालोनी में भी छोड़ने जाता है तो आने -जाने में बीस से चालीस किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। इस हिसाब से एक मरीज को घर तक छोड़ने में सिर्फ डीजल पर ही दो सौ रुपये खर्च हो जाते हैं, जबकि ड्राइवर व मेंटेंस के लिए अलग से खर्च वहन करना पड़ता है। एंबुलेंस संचालकों के मुताबिक, यहां पर दो - तीन मरीज प्रतिदिन मऊरानीपुर, बंगरा, बबीना, बड़ागांव, मोंठ, चिरगांव आदि ब्लाकों से आते हैं। उन्हें भी घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है। ऐसे में लगातार हो रहे घाटे के कारण उनके लिए सेवा देना संभव नहीं है।
उधर, एंबुलेंस संचालकों द्वारा हाथ खड़े कर दिए जाने से स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की परेशानी बढ़ गई है। अब वह इस समस्या को दूर करने के लिए बीच का रास्ता निकालने में जुटे हैं।
सीएमओ डॉ. विनोद यादव के मुताबिक समस्या का हल ढूंढा जा रहा है। अगर कोई उपाय नहीं निकला तो इस पर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में होने वाली जिला स्वास्थ्य समिति की बैठक में चर्चा की जाएगी।

क्या है भुगतान प्रक्रिया?
झांसी। विगत दिनों जनपद के एक दर्जन अस्पतालों में जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम की शुुरुआत की गई। इसमें प्रसूता को प्रसव के बाद घर तक छोड़ने की सुविधा उपलब्ध है। इसके लिए प्रत्येक अस्पताल व स्वास्थ्य केंद्र में प्रति माह 100 प्रसव पर एक एंबुलेंस रखा गया है। इससे ज्यादा पर दो या तीन एंबुलेंस भी रखे जाने का प्रावधान है। एंबुलेंस को प्रतिमाह अधिकतम 25 हजार रुपये की संविदा पर अनुबंधित किया गया है। 100 से कम प्रसव होने पर प्रसूता को घर तक छोड़ने पर प्रति प्रसव 250 रुपये के हिसाब से भुगतान दिया जाता है। इसमें ड्राइवर व दूसरे सभी प्रकार के खर्चे भी शामिल हैं। यानी, अगर सर्विस प्रोवाइडर एक माह में 50 प्रसूताओं को घर तक छोड़ता है तो उसे 12500 रुपये मिलेंगे। आकस्मिक दशा में 100 से ज्यादा प्रसव होने पर 101 से 150 प्रसव पर 150 रुपये एवं 151 से 200 प्रसव पर 125 रुपये की दर से भुगतान का प्रावधान है।

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