इंटरनेट सिंड्रोम के शिकार बन रहे किशोर

Jhansi Updated Mon, 01 Oct 2012 12:00 PM IST
झांसी। केस नंबर एक - शहर के एक प्रतिष्ठित इंग्लिश मीडियम स्कूल में हाईस्कूल में अध्ययनरत पल्लव (बदला हुआ नाम) छह माह से लगातार बीमार रहता है। उसे सिरदर्द, चिढ़चिढ़ापन व थकान की शिकायत रहती है। वह छोटी बात पर भी उग्र हो जाता है। घर से बाहर कम निकलता है और अपना अधिकतर समय कंप्यूटर पर बिताना पसंद करता है।

केस नंबर दो - 14 साल का उजास कुमार (बदला हुआ नाम) का स्कूल में मन नहीं लगता है। उसे अपने दोस्तों से चैटिंग करना पसंद है। दो दिनों तक घर का इंटरनेट खराब होने पर वह लगातार बेचैन रहा। उसकी आंखें खराब हो गई हैं। कमर में दर्द की लगातार शिकायत रहती है। हंसमुख रहने वाला उजास अब गुमसुम रहता है।

यह कोई एक दो मामले नहीं, बल्कि अनेकों बच्चे इसी स्थिति से गुजर रहे हैं। आधुनिकता एवं संचार क्रांति के दौर में नए - नए वैज्ञानिक साधन सुविधाओं के साथ बीमारी भी पैदा कर रहे हैं। इंटरनेट के माध्यम से किसी भी सूचना को क्षण भर में प्राप्त करने एवं सोशल साइट से दोस्तों से गपशप करना भी रोग पैदा करने लगा है। महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कालेज के मनोरोग चिकित्सा विभाग में इन दिनों सोशल नेटवर्क साइट व इंटरनेट की लत के कारण पर्सनैलिटी डिसआर्डर के शिकार मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई है। इन मरीजों में सर्वाधिक संख्या किशोरों की है।
मनो चिकित्सकों की मानें तो छह माह पूर्व तक यहां इस तरह के मरीज नहीं आते थे, लेकिन विगत एक - दो महीने से हर ओपीडी में ऐसा केस आने लगा है, जिसके रोग की जड़ इंटरनेट है। दरअसल, इंटरनेट एक्सेस करना आम बात है। स्कूलों में मिलने वाले प्रोजेक्ट वर्क, होम वर्क व निबंध आदि के लिए बच्चे इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। सिलसिला आगे बढ़ता है तो वह सोशल साइट व इंटरनेट की दूसरी अनजान साइटों की ओर मुड़ जाते हैं। बच्चे भी किसी भी बड़ी शख्सियत से सोशल साइट के माध्यम से आसानी से इंटरनेट पर बात कर सकते हैं। यह आकर्षण उन्हें लगातार नेट से जोड़े रहता है। इससे दोस्तों के साथ कम समय बिताना, बाहरी दुनिया से दूर रहना, कुर्सी पर घंटों चिपके रहना व एक तरफा सोच विकसित होने लगती है। इससे अनेक प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोग पैदा हो जाते हैं। इनका कोई फिजीशियन ठीक तरह से इलाज भी नहीं कर पाता है। ऐसे में अभिभावकों को मनो चिकित्सक के पास जाना पड़ता है।

इंटरनेट एक बीमारी के तौर पर पांव पसार रहा है। किशोर व युवा वर्ग इसमें तेजी से फंस रहा है। बच्चे हर चीज की खोज इंटरनेट पर करने के चक्कर में सोशल साइट्स में फंस जाते हैं। उनमें दोस्ती, गपशप व जवाब ढूंढने की एकतरफा तलब पैदा होने लगती है।
डा. ज्ञानेंद्र कुमार
विभागाध्यक्ष
महारानी लक्ष्मी बाई मेडिकल कालेज


लक्षण
- आंखें खराब होना
- सिरदर्द व कमर में दर्द
- चिड़चिड़ापन महसूस करना
- एकाकी माहौल पसंद करना
- अत्यधिक उग्रता दिखाना

बचाव
- इंटरनेट का प्रयोग कम करें।
- नियमित व्यायाम करें।
- अभिभावक बच्चों की गतिविधियों पर निगाह रखें।
- बच्चों को किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित करें।
- परिवार के माहौल को स्वस्थ बनाएं।


क्या है इंटरनेट सिंड्रोम ?
झांसी। इंटरनेट सिंड्रोम एक प्रकार से बीमारियों का गुच्छा है। इसमें पर्सनालिटी डिसआर्डर, आंखों की बीमारी, कमर दर्द, पीठ दर्द, सिरदर्द, चिढ़चिढ़ापन, थकान, अनिद्रा, एकाग्रता की कमी, बेचैनी आदि बीमारियां एक साथ या एक दूसरे से जुड़ी होती हैं। अलग - अलग रोग को ठीक करना संभव नहीं होता है। संपूर्णता में बीमारी को ठीक करना होता है।

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