प्रदेश में बेटी बचाओ कार्यक्रम फेल!

Jhansi Updated Thu, 27 Sep 2012 12:00 PM IST
झांसी। जिस प्रदेश में बेटियों के पैर छूने की परंपरा हो, वहां बालक के मुकाबले बालिकाओं के लिंगानुपात में बढ़ती खाई बड़ा सवाल खड़ा करने लगी है। शासन और स्वयंसेवी संगठनों द्वारा छेड़े गए कन्या बचाओ मुहिम का यहां कोई असर नहीं दिख रहा है। यह हम नहीं, बल्कि 2011 की जनगणना में दर्ज शून्य से छह वर्ष तक के बच्चे- बच्चियों की संख्या में पिछले एक दशक के दौरान बढ़ा अंतर बता रहा है। दुखद स्थिति यह है प्रदेश के बड़े शहरों की दशा तो खराब हुई ही है, राजधानी भी इससे अछूती नहीं है।
2001 में हुई जनगणना में प्रदेश का बाल लिंगानुपात 916 दर्ज किया गया था, जबकि सन 2011 में यह अनुपात 899 हो गया। यानी, यह खाई और चौड़ी हो गई। प्रदेश के 71 जनपदों के लिंगानुपात का विश्लेषण करने पर मात्र 8 जिलों की स्थिति ही सुधरी दिख रही है, जबकि शेष 63 जिलों में लिंगानुपात में एक से लेकर 51 तक का अंतर आया है। दुखद: स्थिति यह है कि प्रदेश की राजधानी सहित आधुनिक माने जाने वाले बड़े शहर भी कन्याओं को बचाने के लिए आगे नहीं आए। लखनऊ में एक दशक पूर्व लिंग अनुपात 915 था, जबकि 2011 में 913 हो गया।
लिंगानुपात में बढ़ते अंतर पर परिवार कल्याण महानिदेशालय के राज्य समुचित प्राधिकरण के अध्यक्ष चिरंजी लाल व राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के निदेशक मुकेश कुमार मेश्राम ने चिंता जताते हुए सभी जिलाधिकारियों को भेजे पत्र में पीसीपीएनडीटी अधिनियम को प्रभावी तरीके से लागू करने के निर्देश दिये हैं।
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के डा. भीम राव अंबेडकर समाज विज्ञान संस्थान के अध्यक्ष डा. मुहम्मद नईम कहते हैं कि लिंगानुपात की इस बढ़ती खाई के पीछे सामंती सोच व दहेज प्रथा मूल रूप से जिम्मेदार है। पीएनडीटी एक्ट लागू करने में लापरवाही बरते जाने के कारण लोगों को बेटियों को गर्भ में मारने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती है। भ्रूण हत्या कानून का कड़ाई से पालन कराया जाना चाहिए, जिससे इस पर अंकुश लग सके।

चंदौली अव्वल, हरदोई फिसड्डी
झांसी। विकास के मामले में चंदौली जिला भले ही पिछड़ा माना जाता रहा हो, लेकिन बालक- बालिकाओं के लिंगनुपात के मामले में इसने विकसित जिलों को आईना दिखाने का काम किया है। 2001 में यहां शून्य से छह वर्ष तक के बालक- बालिकाओं का अनुपात 937 था, जबकि 2011 में यह 976 हो गया। वहीं, हरदोई की दशा सर्वाधिक खराब पाई गई है। यहां एक दशक पूर्व जहां प्रति हजार बच्चे पर 914 बच्चियां थीं, वहीं 2011 में 863 बच्चियों पर आकर टिक गई।



बुंदेलखंड के शहरों की स्थिति
-----------------------
जनपद -- 2001 -- 2011- गिरावट
------------------------
जालौन - 889 - 880- 09
झांसी - 886 -859 - 27
ललितपुर - 931 - 914- 17
हमीरपुर - 903- 885- 18
बांदा - 917 - 898 - 19
चित्रकूट - 928 - 907 - 21
महोबा - 901 - 897 - 04

प्रदेश के मुख्य शहरों की स्थिति
-------------------
जनपद - 2001- 2011 - गिरावट
मुरादाबाद - 912 - 909 - 03
बरेली - 906 - 900 - 06
मेरठ - 857 - 850 - 07
अलीगढ़ 885 - 871 - 14
इलाहाबाद - 917 - 902 - 15
वाराणसी - 919 - 896 - 23
गोरखपुर - 934 - 905- 29
आगरा - 866 - 835- 31

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