झोकनबाग टौरिया में लड़ी गई थी आजादी की पहली जंग

Jhansi Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
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झांसी। वह 22 मार्च 1858 का दिन था, जब अंग्रेजों की फौज ने ह्यूरोज के नेतृत्व में झांसी में डेरा डाल लिया था। किले के मुख्य द्वार के ठीक सामने झोकनबाग की टौरिया और जीवन शाह की पहाड़ी पर अंग्रेजी फौज तोप व गोला बारुद के साथ मौजूद थी। महारानी लक्ष्मीबाई की सेना ने ब्रिटिश सेना का जमकर मुकाबला किया और 12 दिन तक उसे नगर में प्रवेश नहीं करने दिया।
आज देश की आजादी को 65 साल हो जाएंगे। देश को अंग्रेजाें की गुलामी से मुक्त कराने के लिए झांसी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। आजादी की पहली लड़ाई सही मायने में झांसी से ही शुरू हुई थी, जब ब्रिटिश सरकार ने झांसी को हड़पने की नीयत से हमला बोला। अंग्रेज इतिहासकार वैंलिगटन, उपन्यासकार डा. वृंदावनलाल वर्मा, ओमशंकर असर आदि के अनुसार जनरल ह्यूरोज के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज ने ललितपुर के रास्ते झांसी की सीमा में प्रवेश किया और 22 मार्च 1858 को झोकनबाग की टौरिया तथा जीवनशाह की पहाड़ी पर तोपें जमा दी। झांसी की सेना के सेनानायक काशीनाथ, गुलाम गौस खां, खूबचंद, चुन्नी, धांदू खरना, जवाहर सिंह, रघुनाथ सिंह, गणपति गिरी, दोस्त खां, रहीम खां, झुरू कुंवर, मधुकर, मोतीबाई सहित सैकड़ों लड़ाके झांसी दुर्ग के 22 बुर्जों पर तोप और गोला बारुद लेकर डट गए। उन्होंने बारह दिन तक अंग्रेजों से लोहा लिया, लेकिन तीन अप्रैल 1858 को झांसी के सैनिक दूल्हाजू ने ओरछा गेट खोलकर अंग्रेजों को आने दिया। नतीजतन, झांसी पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया और महारानी लक्ष्मीबाई को कालपी होकर ग्वालियर की तरफ भागना पड़ा।
मैं झांसी हूं शोध ग्रंथ के लेखक शमीम खान बताते हैं कि जिस स्थान पर आजादी की पहली जंग लड़ी गई थी वह सालों तक वीरान रहा। जैसे - जैसे झांसी नगर का विकास हुआ इस क्षेत्र में अतिक्रमण होता रहा। पहले बांस मंडी बनी, फिर मकान बनते गए। बचे हुए स्थान पर महारानी लक्ष्मीबाई पार्क बनाया गया। इसके बाद 16 अक्तूबर 1982 को राजकीय संग्रहालय, बाद में दीनदयाल सभागार एवं प्रदर्शनी के लिए प्रशासन ने मैदान अपने संरक्षण में ले लिया। इससे इस क्षेत्र का विकास होने लगा है, जो अब भी जारी है।

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