गर्दिश में हैं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार के सितारे

Jhansi Updated Tue, 14 Aug 2012 12:00 PM IST
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झांसी। कभी जिला अस्पताल परिसर में पेड़ की छांव तले रात गुजारना, कभी सड़क किनारे बसेरा कर लेना और दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के लिए कचरे से पॉलीथिन इकट्ठी करना। ऐसी जिल्लत भरी जिंदगी जी रहा है भारत मां के उस लाल का परिवार, जो कभी अंग्रेजी हुकूमत से टक्कर लेकर चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों को बम बनाकर देता था। बात हो रही है स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. रामचरन झा की, जिनका मकान तक अंग्रेजों ने कुर्क कर लिया था। उनके परिवार के सितारे गर्दिश में हैं। उन्हीं के बेटे के शब्दों में कहें तो देश आजाद हो गया, लेकिन हम गरीबी से आजाद नहीं हो पाए।
रामचरन झा का जन्म वर्ष 1915 में मुन्नालाल धर्मशाला के पास हुआ था। पिता बड़ागांव निवासी अयोध्या प्रसाद और मां जशोदा देवी की वह इकलौती संतान थे। हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान उन्होंने देश की आजादी के लिए संघर्ष करने की ठानी और झांसी में रहकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन चला रहे चंद्रशेखर आजाद से जुड़ गए। धीरे- धीरे वह बम बनाने लगे और क्रांतिकारियों तक पहुंचाने लगे। इसकी भनक अंग्रेजी हुकूमत को लगी तो उन्हें वर्ष 1942 में गिरफ्तार कर लिया गया। उनको साढे़ तीन साल की सजा हुई। साथ ही उनका पुश्तैनी मकान भी कुर्क कर लिया गया। वर्ष 1946 में जेल से बाहर आने के बाद वह जुगयाना मुहल्ला में किराये का मकान लेकर पत्नी श्रीमती रामकिशोरी और तीन पुत्रों घनश्याम, राधेश्याम व राजकुमार के साथ रहने लगे।
देश आजाद होने के बाद सरकार से मिलने वाली पेंशन से परिवार का गुजारा तो होने लगा, लेकिन बच्चों की उचित शिक्षा- दीक्षा नहीं हो सकी। आमदनी का कोई अन्य जरिया न होने के कारण गृहस्थी किसी तरह खिंच रही थी। बड़ा बेटा घनश्याम दास सिर्फ दसवीं कक्षा तक पढ़ सका। किसी तरह शादी हो गई। बेटा बेरोजगार होने के कारण घनश्याम के पांच बेटों मनमोहन, योगेश, रामगोपाल, जगमोहन व भवानी शंकर की परवरिश भी रामचरन झा को करनी पड़ती थी। माली हालत ठीक न होने के कारण दूसरे बेटे राधेश्याम की शादी ही नहीं हो सकी। जबकि, तीसरा बेटा राजकुमार वर्ष 1995 में ऐसा बीमार पड़ा कि दोबारा न उठ सका। शरीर में खून की अत्यधिक कमी हो जाने के कारण जिला अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गयी। बेटे की मौत से रामचरन झा टूट गए तथा वर्ष 1998 में वह परलोक सिधार गए। बाद में उनकी पत्नी की भी मौत हो गई।
हालांकि, वर्ष 1990 में प्रशासन ने सरकारी राशन की दुकान का लाइसेंस दिया था, लेकिन परिवार बड़ा होने के कारण आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। अब इस दुकान को घनश्याम का बेटा भवानी शंकर चलाता है तथा अलग रहता है। दूसरी ओर, घनश्यामदास उनके भाई राधेश्याम और दो बेटे मनमोहन व जगमोहन खुले आसमान के नीचे जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इधर- उधर पड़ी पालीथिन इकट्ठी कर उसे बेचकर किसी तरह पेट पाल रहे हैं। ‘अमर उजाला’ ने जब परिजनों से बात की तो घनश्याम दास झा रुंधे गले से इतना ही कह सके कि देश तो आजाद हो गया, लेकिन इतने सालोें बाद भी हम गरीबी से आजाद नहीं हो पाए। उनको पीड़ा है कि देश की खातिर उनका मकान कुर्क हो गया था, पर आजादी के बाद किसी सरकार ने मकान वापस दिलाने की पहल नहीं की।

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