दिल - दिमाग के रोगी न जाएं जिला अस्पताल

Jhansi Updated Sat, 11 Aug 2012 12:00 PM IST
झांसी। कभी हादसे का शिकार हो जाएं या हृदयाघात जैसी किसी गंभीर बीमारी की चपेट में आएं तो भूल से भी जिला अस्पताल का रुख न करें। यहां न तो न्यूरो सर्जन हैं और न ही हार्ट स्पेशलिस्ट। किडनी, चर्म रोग जैसी अन्य बीमारियों के विशेषज्ञ भी यहां नहीं हैं। तकरीबन एक दशक से खाली पड़े इन पदों के संबंध में शासन भी वाकिफ है। समय- समय पर स्थानीय स्तर से मांग भी की जाती रही है, लेकिन स्थिति जस की तस है।
जिला अस्पताल की इमरजेंसी 24 घंटे चलती हैं। स्पेशलिस्टों की कमी के कारण यहां बाल रोग, नेत्र रोग, दंत रोग व ईएनटी विशेषज्ञों को इमरजेंसी में ड्यूटी करनी पड़ती है। इस कारण इमरजेंसी में आने वाले 50 प्रतिशत से ज्यादा मरीजों को प्रतिदिन मेडिकल कालेज रेफर कर दिया जाता है या दबी जुबान से निजी अस्पताल जाने की सलाह दे दी जाती है।
करीब एक दशक से मानसिक रोग पीड़ितों के इलाज के लिए मनोचिकित्सक नहीं है। नसों की बीमारी, माइग्रेन, ब्रेन हैमरेज या अन्य प्रकार की आंतरिक व गंभीर चोटों का इलाज करने को यहां न्यूरो सर्जन की कमी अर्से से खल रही है। इसी तरह चर्म रोग विशेषज्ञ नहीं होने के कारण सामान्य चर्म रोगियों को तो परेशानी होती ही है, जलने की वजह से लाए जाने वाले मरीजों को प्राथमिक उपचार तक नहीं मिल पाता।
अस्पताल परिसर में सीएमओ आफिस के ठीक सामने करीब 25 लाख रुपये की लागत से हृदय रोग यूनिट स्थापित की गई है। पांच बेड व हृदय रोग के इलाज के लिए अत्याधुनिक मशीनें तो लगा दी गईं हैं, लेकिन यहां स्टाफ या डॉक्टर की तैनाती नहीं की गई है। ऐसे में हृदय रोगियों के लिए इस यूनिट के कोई मायने नहीं है। अब तो इस वार्ड को वीआईपी मरीजों को रखने के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है।

चिकित्सक - स्वीकृत पद - तैनात
मनोरोग 1 0
न्यूरो सर्जन 1 0
नेफ्रोलाजिस्ट 1 0
हृदय रोग 1 0
मेडिसिन 3 2
सर्जन 3 2
दंत रोग 2 1



अस्पताल में उपलब्ध सुविधाएं एवं संसाधनों का पूरा विवरण शासन को हर माह भेजा जाता है। इसमें चिकित्सकों की कमी का भी उल्लेख होता है। बावजूद इसके शासन की ओर से कोई तैनाती नहीं की गई है।
डा. वी वी आर्या
मुख्य चिकित्सा अधीक्षक
जिला अस्पताल

रेफर मामले में रिकार्ड और सच में बड़ी खाई
झांसी। महिला अस्पताल या जिला अस्पताल में रेफर मरीजों का रिकार्ड सही तरीके से मेंटेन नहीं किया जाता है। परेशानी से बचने के लिए अस्पताल के कर्मचारी अधिकतर मरीजों को बिना आमद दिखाए ही बता देते हैं कि यहां पर इस रोग का कोई उपचार नहीं। जान बचाने के लिए मरीज मेडिकल कालेज या प्राइवेट अस्पताल की शरण लेता है। यहां के आंकड़ों पर गौर करें तो दिन में इक्का- दुक्का मरीज ही यहां से मेडिकल कालेज रेफर किए जाते हैं। जबकि, सच्चाई किसी से छिपी नहीं है।

आईसीयू तक नहीं यहां
झांसी। शहर के दर्जनों छोटे - मोटे प्राइवेट नर्सिंग होम तक में आईसीयू की सुविधा उपलब्ध है, जबकि जिला अस्पताल इस सुविधा से वंचित है।

प्रशिक्षुओं से चलाया जाता है काम
झांसी। 176 बेड और छह वार्ड वाले इस जिला अस्पताल में 04 फार्मासिस्ट व 22 नर्स तैनात हैं। मरीजों का लोड बढ़ने पर फार्मेसी व नर्सिंग कालेज में पढ़ने वाले छात्र- छात्राओं से स्टाफ की कमी की भरपाई की जाती है। कोर्स के लिए आवश्यक प्रायोगिक कार्य के लिए यह विद्यार्थी छह माह तक प्रशिक्षु के रूप में कार्य करते हैं।

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