नई तकनीक से बढ़ा सरसों का उत्पादन-LTP

Jhansi Bureau Updated Sun, 04 Jun 2017 08:19 PM IST
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नई तकनीक से बढ़ा सरसों का उत्पादन
झांसी।
रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय द्वारा सरसों की खेती में किए गए प्रयोग के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। वैज्ञानिक पद्धति से की गई खेती से उत्पादन में कई गुना इजाफा हुआ है। अब इस पद्धति को ज्यादा से ज्यादा किसानों तक पहुंचाने की तैयारी है।
विश्वविद्यालय की टीम द्वारा बबीना और बड़ागांव ब्लाक के चार गांवों में नई पद्धति से सरसों की बुआई की गई थी। चालीस किसानों के खेतों में सरसों बोई गई थी। इसके शानदार परिणाम सामने आए हैं। प्रति हेक्टेयर 15 से 19 क्विंटल उपज प्राप्त हुई है। जबकि, पारंपरिक खेती में यह आंकड़ा अधिकतम सात क्विंटल तक रहता है। वह भी मौसम अनुकूल होने पर।

यह तकनीक अपनाई
कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने किसानों को इंप्रूव्ड वैरायटी के सरसों के बीज (डीआरएमआरआईजे 31, एनआरसीएचडी 101, एनआरसीडीआर 2, आरएस 406 और आरएस 749) उपलब्ध कराए। बीज की पंक्तिबद्ध बुवाई कराई गई। प्रत्येक पंक्ति में 45 सेंटीमीटर का फासला रखा गया। जबकि, पारंपरिक खेती में किसान पंक्तिबद्ध बुवाई न करके, बीज का खेतों में जहां-तहां छिड़काव कर देते हैं।

टीम ने की निगरानी
बुवाई से लेकर कटाई तक कृषि विश्वविद्यालय की टीम फसल की लगातार निगरानी करती रही और किसानों टिप्स देती रही। टीम में विश्वविद्यालय की डा. मधुलिका पांडेय, डा. अंशुमान सिंह, डा. अमित तोमर, डा. सुशील कुमार, डा. विकास और डा. आशुतोष सिंह शामिल रहे।

एकड़ में छह क्विंटल पैदा हुई सरसों
नई पद्धति से सरसों की खेती करने वाले किसानों ने अपने अनुभव साझा किए। कंचनपुर के किसान गिरवर सिंह ने बताया कि पंक्तिबद्ध बुवाई से अच्छा उत्पादन हुआ है। एक एकड़ में लगभग छह क्विंटल सरसों प्राप्त हुई है। कोट बेहटा के किसान ठाकुरदास ने बताया कि पहली बार नई पद्धति से सरसों बोई। अब उनके पास उन्नत बीज भी तैयार हो गया है। इसका इस्तेमाल अगली बार भी करेंगे।

किसान करें नई तकनीकी का इस्तेमाल
सरसों की खेती में नई पद्धति के इस्तेमाल के शानदार परिणाम सामने आए हैं। इस बार इसका दायरा बढ़ाया जाएगा। बुंदेलखंड की जलवायु सरसों की खेती के अनुकूल है। किसानों को इस पर ध्यान देना चाहिए। विश्वविद्यालय हर सहयोग के लिए तैयार है। केवल सरसों ही नहीं, बल्कि अन्य किसी भी फसल के बारे में जानकारियों के लिए विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ उपलब्ध हैं।
- प्रो. अरविंद कुमार, कुलपति

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