डीआईओएस हत्याकांड के आरोपी दोषमुक्त

Jaunpur Updated Sat, 10 Nov 2012 12:00 PM IST
जौनपुर। जिला विद्यालय निरीक्षक दिनेश चंद्र पांडेय हत्याकांड के दो आरोपी साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त करार दिए गए। शुक्रवार को जिला जज जगदीश्वर सिंह ने चर्चित मामले का फैसला सुनाया। एक अन्य आरोपी जितेंद्र प्रजापति के मुकदमे का विचारण उच्च न्यायालय के आदेश पर स्थगित है।
जीजीआईसी परिसर स्थित कार्यालय में 28 मई 2008 को डीआईओएस दिनेश चंद्र पांडेय को गोली मार दी गई थी। जिला अस्पताल पहुंचने पर मृत घोषित कर दिया गया था। मृतक के भाई गोरखपुर निवासी यशवंत पांडेय ने लाइन बाजार थाना क्षेत्र के मियांपुर निवासी अंजनी कुमार श्रीवास्तव तथा जितेंद्र प्रजापति, नेवादा निवासी श्रीप्रकाश सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। पुलिस ने विवेचना पूरी कर आरोप पत्र कोर्ट में दाखिल किया। अभियोजन पक्ष से डीजीसी आशुतोेष चतुर्वेदी ने कुल 17 गवाह पेश किए। बचाव पक्ष से भी दो गवाहों के बयान कराए गए। दोनों पक्षों की बहस सुनने तथा पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर कोर्ट ने अंजनी श्रीवास्तव तथा श्रीप्रकाश सिंह को दोषमुक्त करार दिया।
कोर्ट ने कहा कि अवैध हथियार बरामद करने वाले विवेचक वाईपी शुक्ला ने जांच अपने मातहत पीके पांडेय को सौंप दी। मातहत से निष्पक्ष विवेचना की उम्मीद नहीं की जा सकती। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पंचायत नामा और शव के पोस्टमार्टम तक एफआईआर दर्ज नहीं थी। पोस्टमार्टम की कार्यवाही के बाद मृतक के परिजनों से राय मशविरा करके कोतवाली में एफआईआर दर्ज कराई। यह भी पाया गया कि विवेचक सगीर अहमद ने अपनी डायरी के पन्ने पर मृतक के मृत्यु पूर्व बयान के रूप में फर्जी साक्ष्य तैयार किया। मुकदमे में बार-बार विवेचना बदली गई। किसी भी विवेचक ने विश्वसनीय साक्ष्य संकलित करने का प्रयास नहीं किया। घटना के दूसरे दिन विवेचक तत्कालीन कोतवाल वाईपी शुक्ला ने मृतक के भाई यशवंत पांडेय तथा उसके चचेरे भाई प्रेम चंद्र पांडेय का झूठा और बनावटी बयान दर्ज किया। अज्ञात अभियुक्त के स्थान पर श्रीप्रकाश सिंह का नाम लाया गया। बाद के विवेचक तत्कालीन फूलपुर थानेदार आरएन पांडेय ने वादी के बयान दर्ज कर पहले के विवेचक वाईपी शुक्ला द्वारा प्रकाश में लाए गए कुछ आरोपियों के नाम निकाल दिए। अंत में सीओ ओमवीर सिंह ढाका ने अपनी विवेचना में निष्कर्ष दिया कि जिन तीन आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हो चुकी है उन्हें छोड़कर बाद में प्रकाश में लाए गए आरोपियों के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है। कोर्ट ने विवेचना पर सवाल उठाते हुए गवाहों के बयान को संदिग्ध करार दिया।
डीआईओएस कार्यालय के जो अधिकारी और कर्मचारी एफआईआर में और विवेचना के दौरान प्रत्यक्षदर्शी साक्षी होना बताया गया इनमें से किसी भी निष्पक्ष साक्षी को पेश करके घटना के तथ्य पर गवाही नहीं कराई गई। अभियोजन पक्ष आरोपियों पर आरोप सिद्ध करने में असफल रहा। कोर्ट ने आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया।

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