...तो पिस्तौल लेकर पढ़ने जाएं लड़कियां!

Jaunpur Updated Wed, 03 Oct 2012 12:00 PM IST
मनोज श्रीवास्तव
जौनपुर में 25 सितंबर की दोपहर रामकिशुन सिंह महाविद्यालय, सिद्दीकपुर में जो हुआ उससे लड़कियों का दिल दहल गया। शोहदों को जब एक लड़की के हमदर्दों ने छींटाकशी से रोका तो मनबढ़ मनचलों ने न केवल लड़की, बल्कि उसके साथ खड़े होने वालों पर चाकू से हमला कर दिया। इस वारदात को लेकर चट्टियों पर चर्चाएं बंद भी न हुई थीं कि जिले के ही कयार गांव में छेड़खानी से छात्राएं इस कदर आजिज हुईं कि पेन-पेंसिल पकड़ने वाले हाथों से उन लोगों की बंदूक छीन कर तोड़ डाली जिन्होंने शोहदों की खैरख्वाही की। सोमवार को तो हद ही हो गई, जब अंबरपुर गांव के पास शोहदों ने एक बस में सवार छात्राओं के साथ बेहूदगी करने के साथ न केवल मारपीट की, बल्कि बस को तोड़ कर अपनी कायरता का परिचय दिया।
छात्राओं के साथ छेड़खानी की घटनाएं नई नहीं, पर पढ़ाई-लिखाई में कीर्तिमान बनाने वाले जौनपुर जिले में हफ्ते भर में जिस तरह वारदातें हुईं, वह शर्मनाक हैं। क्या हो गया है जिले के लड़कों को? क्या हमउम्र लड़कियां केवल उनकी बेशर्मी का साधन मात्र बन सकती हैं, दोस्त नहीं। चढ़ती उम्र में उनकी मूंछ क्या बस इस बात पर ऊंची हो सकती है कि उन्होंने किसी पढ़ने जाने वाली लड़की के साथ बेहूदगी की? रुकने का नाम न लेने वाली ऐसी वारदातें तो समाज पर भी सवाल उठा रही हैं। किसी को इतना गुस्सा क्यों नहीं आ रहा है कि शोहदे कांप जाएं? क्या लोगों को इसकी भी फिक्र नहीं है कि ऐसी घटनाओं के सरगर्म होने के बाद तमाम मां-बाप अपनी लड़कियों को दूर पढ़ने भेजने की बजाय घर में चूल्हे-चौके के काम में सीमित कर देंगे?
सवाल खाकी वर्दी से भी होने चाहिए। कप्तान को बताना चाहिए कि उनकी पुलिस इतना इकबाल क्यों नहीं पैदा कर सकी कि शोहदे ऐसी घृणित वारदात को अंजाम करने से पहले सिहरते? छेड़खानी की दो घटनाओं के बाद ऐसे कदम क्यों नहीं उठाए गए कि उस कड़ी में सोमवार को एक और घटना को अंजाम देने से पहले मनचलों की हड्डी कांपती। तकलीफ तो इस बात पर भी है कि हाल ही में हाईकोर्ट ने लड़कियों के साथ बदसलूकी की घटनाओं पर चिंता और गुस्सा जताया। बावजूद इसके सोमवार को थानेदार शोहदों को सबक सिखाने से ज्यादा थाने के सीमा विवाद को तवज्जो देते रहे। कम से कम इस मामले में अपने मुख्यमंत्री से नसीहत ली जा सकती थी जिन्होंने छेड़खानीे के आरोप में आईएएस अफसर को निलंबित करने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई।
सर्वाधिक निराश तो सियासत कर रही है। ऐसी घटनाओं पर न किसी राजनीतिक दल के माथे पर सवलटें दिख रही हैं और न ही ऐसा जज्बा जो कालेज जाती हर लड़की से कह सके कि चलो पढ़ने कुछ नहीं होगा, हम जो तुम्हारे साथ हैं। छेड़खानी और लड़कियों के साथ बदसलूकी के मामलों में अगर समाज, पुलिस और सियासत के लोग क्रूर खामोशी अख्तियार करे रहे तो तय है कि गांव-कस्बों की लड़कियों की तालीम का रास्ता या तो काफी संकरा हो जाएगा या फिर पढ़ने की जिद करने वाली हर लड़की को कापी-किताबों के साथ अपने बैग में एक पिस्तौल लेकर जाना होगा?

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