देश पर कुर्बान हुए केराकत के नौ सपूत

Jaunpur Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
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थानागद्दी। आजादी की 65वीं वर्षगांठ पर आइए सलाम करते हैं िजले के जांबाजों को। केराकत के नौ शहीदों में पहला नाम अकबरपुर के जगदीश सिंह का है। अगस्त 1999 में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवान जगदीश सिंह की अकबरपुर गांव में खड़ंजा बिछाने की योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। डोभी के नरकटा निवासी शकील खां सेना में अपनी काबिलियत का लोहा मनवाते हुए जम्मू के उड़ी सेक्टर में सितंबर 2000 में शहीद हुए। केराकत के पटइल निवासी सत्येंद्र प्रताप सिंह 13 अक्तूबर 2000 को जम्मू कश्मीर के माहौर चिरबगला में शहीद हो गए। तेजपुर कुसरना की माटी के लाल धीरेंद्र यादव ने कुपवाड़ा सेक्टर में दुश्मनों के छक्के छुड़ाते हुए 26 दिसंबर 2000 को कुर्बानी दे दी। 1976 में डोभी के छोटी मढ़ी गांव में जन्मे मनीष सिंह रघुवंशी की राइफल 2001 में जब सीमा पार गरजी तो दुश्मनों के पांव उखड़ गए। देश के लिए लड़ते हुए 9 सितंबर 2001 को मनीष ने आखिरी सांसें ली। जलालपुर के नेवादा गांव निवासी तेज बहादुर सिंह ने 1971 में भारत-पाक युद्ध और1999 में कारगिल युद्ध में अदम्य साहस का परिचय दिया। राजौरी सेक्टर में घुसपैठियों से मुठभेड़ के दौरान 28 मई 2002 को यह शेर शहीद हो गया। 29 दिसंबर 2006 को केराकत के घुड़दौड़ निवासी संजीव सिंह भटिंडा पंजाब में शहीद हुए तो भैरोभानपुर के जमुना प्रसाद गिरी ने 6 अप्रैल 2010 को रायपुर के दंतेवाड़ा में नक्सलियों से मुठभेड़ में शहादत दी। केराकत के फौजी खानदान से जुड़े जावेद खां भी सरहद पर कुर्बानी देकर उन रणबांकुरों में शामिल हुए जिन्हें कफन के रूप में तिरंगा नसीब हुआ।
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