1942 में ही लहरा दिया था तिरंगा

Jaunpur Updated Tue, 14 Aug 2012 12:00 PM IST
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मछलीशहर। देश की आजादी की औपचारिक घोषणा भले ही 15 अगस्त 1947 को हुई लेकिन क्षेत्र के गोधूपुर गांव निवासी स्व. नंद किशोर तिवारी ने 15 अगस्त 1942 को ही मछलीशहर तहसील में तिरंगा लहरा दिया था। जेल में 22 वर्षों की कठोर सजा काटे स्व. तिवारी को देश आजाद होने के साढ़े छह वर्ष बाद रिहा किया गया।
नंद किशोर तिवारी की पत्नी नंदा देवी और पौत्र अखिलेश भार्गव के मुताबिक तिरंगा फहराने पर तत्कालीन एसडीएम भूप नारायण ने नंद किशोर को बंदीगृह में डाल दिया था। घंटेभर के अंदर हजारों लोगों ने तहसील को घेर लिया। जनआक्रोश देख प्रशासन ने नंद किशोर को छोड़ दिया। इधर नंदकिशोर की गिरफ्तारी पर जनाक्रोश का आलम यह रहा कि तत्कालीन तहसीलदार के घर में घुस कर उनकी छह दिन की बेटी को अपने कब्जे में ले लिया गया। उसी रात नंद किशोर के नेतृत्व में दूधनाथ सिंह, बद्री प्रसाद उपाध्याय, रामजस मौर्य, माता प्रसाद मौर्य, वासुदेव यादव, गंगा राम जायसवाल आदि ने थाने पर पहरा दे रहे संतरी को बंधक बना कर उसकी राइफल छीन ली और बीज गोदाम लूट कर टेलीग्राफ का तार काट दिया। नंद किशोर को खत्म करने की नियत से 18 अगस्त सन 1942 को एसडीएम और कोतवाल के नेतृत्व में भारी पुलिस बल उनके घर की तरफ कूच की लेकिन गांव के बाहर ही लोगों ने फोर्स को रोक दिया। इससे तिलमिलाए एसडीएम के आदेश पर कई राउंड हवाई फायर हुआ लेकिन आजादी के दीवाने इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए हजारों की संख्या में लोग डटे रहे। वहां मौजूद मीरगंज के करियांव निवासी राम दुलार सिंह ने ललकारते हुए कहा कि दम हो तो गोलियां सीने में दागो। उनकी यह ललकार एसडीएम को चुभ गई और उसने राम दुलार को गोली मार दी। मौके पर ही वे शहीद हो गए। फायरिंग में घायल हुए माता प्रसाद शुक्ल की भी उसी दिन मौत हो गई। कुछ दिनों बाद नंद किशोर तिवारी ने इलाहाबाद-जौनपुर मार्ग स्थित मरी माई का पुल तोड़ने की योजना बनाई। 22 अगस्त की रात भूलन राम यादव, सूर्यबलि सिंह, राजा राम यादव, भगौती तिवारी, जवाहिर शुक्ल, शिव बेचन शुक्ल, वासदेव यादव, रामजस मौर्य, माता प्रसाद मौर्य ने नंद किशोर के नेतृत्व में पुल को तोड़ डाला। पुल तोड़ने के पीछे नंद किशोर की साजिश मान कर प्रशासन ने उन्हें फिर मारने की योजना बनाई। कोतवाल के नेतृत्व में फोर्स ने नंद किशोर के घर में लूटपाट कर आग लगा दी। कई दिनों बाद एक मुखबिर की सूचना पर अमारा गांव से नंद किशोर तिवारी को गिरफ्तार कर लिया गया। 14 दिसंबर 1942 से 27 अप्रैल 1943 तक तक स्व. तिवारी को जौनपुर जेल, फिर वाराणसी सेंट्रल जेल में रखा गया। जेल में 22 वर्षों की कठोर सजा काट रहे स्व. तिवारी को देश आजाद होने के साढ़े छह वर्ष बाद रिहा किया गया। 25 मार्च 1981 को नंद किशोर तिवारी ने अंतिम सांसे ली।
शहीद स्तंभ की किसी ने नहीं ली सुधि
बक्शा। देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए जिन सपूतों ने अपना सब कुछ निछावर कर दिया था, उनकी याद में बना शहीद स्तंभ आज उपेक्षित पड़ा है। 1942 के आंदोलन में अगरौरा, धनियामऊ, सरायहरखू, जंगीपुर, चितौड़ी, खुंशापुर, दरियावगंज सहित अन्य गांवों के युवा कूद पड़े। 15 अगस्त 1942 को धनियामऊ पुल तोड़ कर अंग्रेजों के आवागमन का रास्ता बंद करने की योजना बनी। 16 अगस्त को हैदरपुर निवासी जमींदार सिंह के नेतृत्व में आंदोलनकारियों की टोली पुल तोड़ने पहुंची। खबर लगने पर पहुंचे अंग्रेज सिपाहियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। घायल जमीदार सिंह की मौके पर जबकि गैरीखुद के राम निहोर, अगरौरा के राम अधार सिंह और राम पदारथ चौहान की दो दिन बाद मौत हो गई। कुछ दिनों बाद अगरौरा के रामनानंद और रघुराई को भी पुल तोड़ने में शरीक बता कर फांसी पर लटका दिया गया था। शहीदों की याद में धनियामऊ के पास शहीद स्मारक बनवाया गया। कई वर्ष बाद तत्कालीन मंत्री स्व. उमानाथ सिंह के सहयोग से इस स्थल का जीर्णोद्धार हुआ लेकिन इसके बाद न तो प्रशासन और न ही जनप्रतिनिधियों ने इस महत्वपूर्ण स्थल की सुधि ली।

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