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साढ़े चार सौ मजदूरों पर संकट

Jaunpur Updated Fri, 29 Jun 2012 12:00 PM IST
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जौनपुर। यूपी स्टेट यार्न कारपोरेशन की सिद्दीकपुर कताई मिल की बंदी की घोषणा के बाद उस पर आश्रित करीब साढ़े चार सौ कर्मचारियों के भविष्य पर संकट के बादल छा गए। मिल तो अस्थायी तौर पर 28 अप्रैल 2012को ही बंद कर दी गई थी लेकिन कर्मचारियों को शासन से सहायता की उ म्मीद थी। राज्य सरकार भी मिल बंदी का फैसला लेने मेें हिचकती रही । वह पहले एक महीने फिर पंद्रह दिन और एक-एक हफ्ते का एक्सटेंशन देती रही। 27 जून को जब एक्सटेंशन की अवधि खत्म हुई तो शासन को अंतत: बंदी का निर्णय लेना पड़ा। मिल के 400 कर्मचारियों को पहले ही वीआरएस दे दिया गया था। लेकिन अभी 450 कर्मचारियों की देनदारियां बाकी हैं। इधर मिल के बंदी की घोषणा से उसके कर्मचारी मायूस हो गए। उनके समक्ष नए सिरे से रोजी रोटी तलाशने का संकट खड़ा हो गया। गुरुवार सुबह क्षेत्र के कांग्रेस विधायक नदीम जावेद ने मजदूरों से मुलाकात कर मिल को दोबारा चालू कराने का भरोसा दिलाया। बुधवार को प्रदेश की रायबरेली और जौनपुर मिल बंद कर दी गई थीं। अब केवल बाराबंकी कताई मिल ही चल रही है।
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मरलूम हो कि सिद्दीकपुर कताई मिल में 30 मार्च 2011 तक सब कुछ ठीक ठाक था। पहली अप्रैल 2011 से मिल के हालत बिगड़ने लगे। मिल प्रवंधन की ओर से मिल बंद करने के संकेत के खिलाफ चार अप्रैल से कर्मचारियों ने स्लो डाउन हड़ताल शुरू कर दी। मिल के सस्पेंडल तो घूम रहे थे लेकिन उत्पादन शून्य था। बिजली का बिल 32 से 35 लाख महीने और उत्पादन साढ़े सात टन से घट कर डेढ़ टन हो गया। कारोबार चौपट हुआ तो प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा। जून के बाद तत्कालीन डीएम गौरव दयाल ने मजदूर नेताओं, मिल प्रबंधन के साथ तीन बार बैठक की। डीएम ने मजदूरों को समझाया कि वे बिना शर्त काम पर लौट आएं। शासन स्तर पर उनकी पैरवी वह खुद करेंगे। लेकिन मजदूर राजी नहीं हुए। मजबूरन डीएम ने चेतावनी जारी कर दी कि 30 जून तक कर्मचारी काम पर नहीं लौटेंगे तो मिल बंद कर दी जाएगी। 15 जुलाई की रात 11 बजे मिल औपचारिक तौर पर बंद कर दी गई। फिर वार्ता के दौर शुरू हुए। जिला पंचायत सदस्य जया दुबे द्वारा अनशन शुरू किया गया। तत्कालीन डीएम भी शासन स्तर पर पैरवी में लगे रहे। डीएम के प्रयास पर 29 जुलाई को मिल में काम शुरू हुआ। इस गतिरोध का सीधा असर कारोबार पर पड़ा। जब 25 हजार स्पेंडल घूम रहे थे तो उत्पादन 7.5 टन था। दोबारा मिल चालू तो जरूर हुई लेकिन उत्पादन तीन टन के आसपास ही रहा। इसके चलते मिल प्रबंधन ने 13 हजार स्पेंडल स्थायी तौर पर बंद कर दिए।
पहले दौर में वीआरसए के लिए आए करीब 11.25 करोड़ में से 400 कर्मचारियों को भुगतान कर दिया गया। करीब 450 कर्मचारी इस उम्मीद में थे कि मिल को सरकारी सहायता मिलेगी और दोबारा काम शुरू होगा। वीआरएस आवेदन में देर की और मामला शासन में लटक गया। इधर, विधानसभा चुनाव शुरू हो गए। अधिकारी कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं थे। लिहाजा मिल को एक्सटेंशन दिया जाने लगा। इधर, मिल प्रबंधन लगातार वर्किगिं कैपिटल और एक्सटेंशन की मांग करता रहा। कताई मिल मजदूर संघ के महामंत्री आत्माराम पांडेय ने कहा कि सपा सरकार से काफी उम्मीदें थी। कैबिनेट मंत्री पारसनाथ यादव ने आश्वासन दिया था कि मिल बंद नहीं होने दी जाएगी। इस उम्मीद में एक्सटेंशन मिलता रहा। 27 जून को सरकार ने उम्मीद भी तोड़ दी। पैसा भले ही नहीं देते लेकिन एक्सटेंशन दे देते तो उम्मीद बंधी रहती।

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