मां की गुनाह का सजा भुगत रहे बच्चे

Jaunpur Updated Sun, 27 Oct 2013 05:40 AM IST
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जौनपुर। जिला जेल में दस ऐसे मासूम पल बढ़ रहे हैं जो मां के गुनाहों की सजा भुगत रहे हैं। इनकी माताएं किसी न किसी आरोप में निरुद्ध हैं। ये सभी पांच साल की उम्र तक के हैं। इनमें एक दुधमुंहा भी है। ऐसे में इनके भविष्य की चिंता गहरा रही है।
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पांच साल से कम की उम्र में सोनम, उमंग, आर्या, अंकेश, रंजना, अंकिता, अंजलि, अर्जुन, अंश और एक दुधमुंहा का बचपन घर के आंगन में नहीं बल्कि जेल की चहारदीवारी के बीच गुजर रहा है। इनमें एक बच्चा ऐसा भी है जिसने अभी जल्द ही जिला अस्पताल में जन्म लिया और सीधे जेल चला गया। इन मासूमों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए जरूरी पोषाहार भी जेल में मिल पाना नामुमकिन है। जेल मैनुअल में बच्चों को पोषाहार, मिनरल या फिर ऐसे आहार देने की व्यवस्था नहीं है। बंदियों को मिलने वाला भोजन ही बच्चों को ही मिलेगा। हालांकि कारागार में निरुद्ध दो महिलाओं को इन्हें ककहरा सिखाने के लिए लगाया गया है। जेल मैनुअल के अनुसार इन्हें शिक्षा और खेलने की आजादी है लेकिन जेल तो जेल ही है। अधिकतम पांच वर्ष की उम्र तक इन्हें जेल में रखा जा सकता है। पांच वर्ष से उम्र अधिक हो गई तो बच्चे को बाहर किया जाएगा। शर्त यह है कि बच्चे को नेचुरल गार्जियन के हवाले ही किया जाएगा। यदि दादा, दादी, चाचा, चाची, मौसी जैसे नेचुरल गार्जियन में कोई नहीं है तो बच्चे को जेल में रखने की अनुमति होगी।
बच्चों का मन ब्लैक बोर्ड की तरह होता है। जेल के वातावरण का प्रभाव उनके मन पर पड़ना स्वाभाविक है। छोटी सी उम्र में बच्चा तमाम ऐसी बातें चाहे अनचाहे जान लेता है जो उसे नहीं जानना चाहिए। जेल में उनके मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। कैदियों की चाल-ढाल और शक्ल-सूरत से प्रभावित होना लाजिमी है।
प्रो. आरएन सिंह, मनोवैज्ञानिक
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कानून इस बात की इजाजत नहीं देता कि इस तरह के छोटे बच्चों को जेल में रखा जाए। जेल का वातावरण बच्चों के रहने लायक नहीं होता। छोटे बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए जेल प्रशासन उचित पोषाहार मुहैया नहीं करा सकता। इन बच्चों की जिम्मेदारी उनके पिता, दादा या किसी और नेचुरल गार्जियन को देना चाहिए।
राजीव गुप्ता, वरिष्ठ अधिवक्ता
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त्योहारों के मौके पर इन बच्चों को घर जैसा माहौल देने की कोशिश की जाती है। मिठाई, कपड़े, खिलौने भी मुहैया कराए जाते हैं। हमारी कोशिश होती है कि बच्चों को घर जैसा माहौल मिले। समय पर भोजन और जरूरी अन्य खाद्य पदार्थ मुहैया कराए जाएं। जेल मैनुअल के तहत हर सुविधाएं बच्चों को दी जा रही हैं।
ललित मोहन पांडेय, जेल अधीक्षक
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बच्चों के लिए जेल मैनुअल
इन्हें शिक्षा और खेलने की आजादी है लेकिन जेल तो जेल ही है। अधिकतम पांच वर्ष की उम्र तक इन्हें जेल में रखा जा सकता है। पांच वर्ष से उम्र अधिक हो गई तो बच्चे को बाहर किया जाएगा। शर्त यह है कि बच्चे को नेचुरल गार्जियन के हवाले ही किया जाएगा। यदि दादा, दादी, चाचा, चाची, मौसी जैसे नेचुरल गार्जियन में कोई नहीं है तो बच्चे को जेल में रखने की अनुमति होगी।
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