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स्वयंभू है दियावां नाथ मंदिर का शिवलिंग

Varanasi Bureau Updated Sat, 11 Aug 2018 01:56 AM IST
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मछलीशहर। आस्था के प्रतीक दियावां महादेव मंदिर का शिवलिंग स्वयं भू है। प्राचीन काल से ही यह मंदिर सिर्फ क्षेत्र के लिए ही नहीं बल्कि भदोही, वाराणसी, इलाहाबाद आदि जनपदों के लोगों के भी आराधना का केंद्र बना हुआ है। यह भव्य शिव मन्दिर दतांव-अरुआवा मार्ग पर बसुही नदी से सटा है। बसुही नदी मंदिर की छटा में चार चांद लगाती है। यहां ऐसी मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करता है उसको मन वांछित फल अवश्य मिलता है। इसी कारण से यहां हर सोमवार एवं शुक्रवार को लगने वाले मेले में भारी भीड़ होती है। पूरे सावन माह में शिवभक्तों और कावरियों का तांता लगा रह रहा है। सैकड़ों की सख्या में श्रद्धालु अपनी मिन्नते मांगने और मत्था टेकने दूरदराज से आ रहे हैं।
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मंदिर में स्थापित शिवलिंग के विषय में जनश्रुति है कि त्रेता युग में प्रभु श्री रामचंद्र के अनुज शत्रुघ्न बाणासुर नामक राक्षस पर विजय प्राप्त करने के लिए इस परिसर में पधारे। उन्होंने ही यहां शिवलिंग की स्थापना कर पूजन किया। तत्पश्चात बाणासुर पर विजय प्राप्त की। स्थापित शिवलिंग का तत्कालीन नाम दीनानाथ रखा गया और उसी नाम से प्रसिद्ध हुआ। हजारों-हजारों वर्ष पुराना शिवलिंग होने कारण पाताल भेदी है। स्थानीय लोगों एवं इतिहासकारों का कहना है कि 600 वर्ष पूर्व यहां जंगल था। उसी में बेलौना कला गांव के निवासी सूबेदार दुबे अपने पशुओं को चराया करते थे। शिवलिंग घास के झुरमुट और झाड़ियो के बीच था। वहां गाय चराते समय जब जाती तो अपना दूध स्वंय गिरा देती थी। इस रहस्य को बहुत दिनों तक गाय के मालिक सूबेदार दुबे नहीं जान पाए । एक दिन संयोगबश उन्होंने उस घास की झाड़ियों में छिपे शिवलिंग पर गाय का दूध गिरते हुए देखा तो आश्चर्य चकित हो गए और जब वहां जाकर देखा तो घास के झुरमुट में एक शिवलिंग दिखाई दिया, जो दूध से भीगा था। सूबेदार ने गांव वालों को बताया। जिसकी चर्चा पूरे क्षेत्र में हो गई। इसके बाद पं. सूबेदार इस शिवलिंग की खुदाई करके अपने गांव बेलौना कला ले जाना चाहते थे। कई दिनों तक खुदाई के बाद भी कार्य में सफलता नही मिली। इसके बाद दियावां गांव के निवासी भगौती प्रसाद मिश्र (पण्डा) ने क्षेत्र के सहयोग से एक मंदिर का निर्माण कराना चाहा जिज्ञासा वश शिवलिंग के बगल खुदाई का कार्य शुरू कराए जैसे-जैसे खुदाई नीचे बढ़ती गई, वैसे-वैसे शिवलिंग नीचे मोटा दिखाई पड़ा और उसके अंत का पता नही चल सका। यह खुदाई सात अरघा (योनी) तक कि गई । तब रात को सभी भक्तों को भगवान शिव ने स्वप्न दिया कि मेरे अंत की जिज्ञासा करना तुम लोगों के लिए निष्फल साबित होगा। इसलिए ऊपर के अरघे पर मंदिर बनाकर पूजा करो हम तुम्हारे क्षेत्र का कल्याण करेंगे। तब इस स्थान को दियावां महादेव के नाम से प्रसिद्धि मिली। तब से इस स्थान का नाम दियावां महादेव पड़ गया ।


मछलीशहर। मंदिर के पुजारी चन्द्रमा मिश्र के अनुसार पूरे सावन मास में प्रतिदिन रुद्राभिषेक का पाठ किया जाता है। सावन में हर रोज तीन से चार लोग यहां रुद्राभिषेक कराते हैं। उन्होंने बताया कि प्राचीन मंदिर होने के बावजूद भी पर्यटन विभाग की नजर इस तरह नहीं है। विकास की दृष्टि से मंदिर परिसर अछूता है।

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