मजबूरीः स्कूल छोड़ फिर पहुंचे मजदूरी करने

Jalaun Updated Sun, 07 Oct 2012 12:00 PM IST
उरई (जालौन)। अमर उजाला की पहल पर बीएसए ने दो मजदूर निरक्षर बच्चों को दो विभिन्न स्कूलों में विगत चार अक्तूबर को भर्ती कराया था वे दोनों बच्चे स्कूलों से भागकर मजदूरी करने पहुंच गए। इन बच्चों ने कहा, मां दिहाड़ी मजदूर हैं। कहा कि साथ ही वे दोनों जो कमाते है, उसी से घर में सभी का पेट पलता है। हमें पता है कि शिक्षा से जीवन बेहतर बनता है। लेकिन हम आज क्या करें। पिछले दो दिनों घर में हम लोग आधा अन्न खाकर सोए। आप बताइये कि क्या उसूल (आदर्श) को चूल्हे में पकाए।
ग्यारह वर्षीय राजू ने बताया कि उसकी पढ़ने की बेहद इच्छा है, इसीलिए बीती 4 अक्तूबर को वह जिला बेसिक शिक्षाधिकारी वरुण कुमार सिंह की जीप में खुशी खुशी बैठ गया था। लेकिन पिछले दो दिनों में स्कूल में कोई बस्ता किताब आदि नहीं मिली। उसके पिता पप्पू पिछले आठ साल से किसी संगीन मामले में जिला जेल में बंद हैं। मां सलमा रोशन स्कूल में आया का काम करती है। वह इतना नहीं कमाती है कि मां बेटे का पेट भर सके। इसीलिए वह कलेक्ट्रेट में मसाले वाले चना बेच कर 90 से सौ रुपए प्रतिदिन कमा लेता है। जिससे परिवार में मां बेटे के दोनों जून पेट भरने का इंताम हो जाता है। उसने कहा कि यदि वह स्कूल में सुबह दस बजे से शाम चार बजे तक पढ़ेगा तो फिर घर में चूल्हा कैसे चलेगा।
मालूम हो कि बीएसए बीती 4 अक्तूबर को ग्यारह वर्षीय राजू को प्राइमरी स्कूल बघौरा में कक्षा तीन में पंजीकृत करा दिया था। राजू ने बताया कि दो दिन किताबें न होने से वह क्लास में किसी तरह
बैठा रहा। शाम को जब खाली हाथ घर मुहल्ला लहारिया पुरवा में पहुंचा तो मां सलमा का चेहरा उदास था। सवाल था कैसे चूल्हे पर खाना पकेगा। बस पेट भरने की जुगाड़ में आज वह स्कूल से भागकर घर पहुंचा। मां सलमा
से मसाला चना बनवाए। उन्हें लेकर कलेक्ट्रेट में फिर से कमाने आ गया।
राजू ने कहा कि हमसे अति गरीब छात्रों के लिए ऐसी व्यवस्था हो कि वे एक या दो घंटे स्कूल में प्रतिदिन पढ़ लें। बाद में अपना व परिवार के पेट भरने का जुगाड़ भी कर लेें।
11 वर्षीय रामपाल भी निरक्षर रहा। वह नगर के कांशीराम आवासीय कालोनी में विधवा मां शांति देवी तथा अपने सबसे छोटे भाई दिलीप (6) के साथ रहता है। मां शांति देवी शादी विवाह में
पूड़ी बेलने का काम करती है। काम न होने पर घरों में वर्तन मांजने का काम करती है। जिससे मुश्किल में 500 रुपए महीना कमाती है। सूपा में गेहूं में साफ करती हुई विधवा शांति देवी ने बताती हैं कि पति राधेश्याम
पांचाल का तीन वर्ष पहले निधन हो गया है। इन दोनों बच्चों की जिम्मेदारी उनकी है। लेकिन मेहनत मजदूरी करके सबसे बड़ा बेटा रामपाल (11) ही पूरे परिवार को पेट पालता है। वह कलेक्ट्रेट की कैंटीन में 1800 रुपए
प्रतिमाह पर काम करता है। उसे चाय नाश्ता तथा शाम को खाना कैंटीन वाला ही देता है। अठारह सौ रुपए में किसी तरह हम तीनों का पेट पल जाता है। रामपाल ने बताया कि 4 अक्तूबर को
बीएसए वरुण कुमार सिंह उसका पंजीकरण काशीराम कालोनी के प्राइमरी स्कूल में कक्षा तीन में करा दिया था। दो दिन बाद भी उसे किताबें नहीं मिली। दोनों दिन
शाम को जब स्कूल से लौटा तोे
मां का चेहरा बहुत उदास दिखा। इसीलिए वह आज स्कूल नहीं
गया और कलेक्ट्रेट में कैन्टीन में नौकरी करने चला आया।
विधवा मां शांति देवी बताती हैं कि भीषण गरीबी आड़े आती है। बेटा रामपाल नहीं कमाएगा तो हम खाएंगे क्या। इसे देख लगता है कि शिक्षा विभाग के अधिकारी ऐसा प्रयास करें कि एेसे बच्चे भी पढ़ जाए और घर में चूल्हा भी जलता रहे।
मां को रसोइया बनाया जाएगा
उरई (जालौन)। जिला बेसिक शिक्षाधिकारी वरुण कुमार सिंह ने बताया कि दोनों निरक्षर बच्चों राजू की मां सलमा तथा रामपाल पांचाल की विधवा मां शांति देवी को स्कूलों में मिडडेमील रसोइया बनाया जाएगा। जिससे दोनों मांओं के साथ ही स्कूल में पढ़ने पर इन बच्चों को मिडडेमील का भोजन मिलेगा तथा उन्हें दो-दो हजार रुपए प्रतिमाह वेतन भी मिलेगा। जिससे उन बच्चों की पढ़ाई भी चलेगी और घर का चूल्हा भी बंद नहीं होगा।

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