मां-बाप के कहे को मानते हैं भगवान का आदेश

Jalaun Updated Mon, 01 Oct 2012 12:00 PM IST
उरई (जालौन)। आज के दौर में बूढ़े माता-पिता अपनी ही संतानों से अपमानित किए जा रहे हैं। घर से निकाले जा रहे हैं, पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने मातृ देवो भव: पितृ देवो भव: के सूत्र वाक्य को अपने आचरण में समा रखा है। अर्थात उनके लिए माता-पिता ही देवता हैं और उनकी आज्ञा को भगवान की आज्ञा मानकर पूरी करते हैं। ऐसे भी परिवार हैं जो सिर्फ मां बाप ही नहीं बल्कि अपने सास ससुर को भी अपने साथ रखकर उनकी सेवा करते हैं।
उरई नगर में प्रख्यात सर्जन रमेशचंद्रा की पत्नी डा.रेनू चंद्रा भी चिकित्सक हैँ। इस आदर्श दंपति ने अपने अपने बूढ़े मां-बाप की सेवा से समाज के लिए एक उदाहरण पेश किया है। रमेशचंद्रा ने बताया कि पिता राधेश्याम गुप्ता तथा मां रामजानकी गुप्ता जब क्रमश: 70 व 65 वर्ष के हैं तब उन्हें गांव से अपने यहां ले आए। डा.रेनू चंद्रा बताती हैं कि वर्ष 1996 से माता श्रीमती सरला सिंह व पिता सेवानिवृत जेलर एसके सिंह को अपने पास रखे हैं। इस समय दोनों समधी प्रेम से शतरंज और ताश खेलते हुए बड़े प्रेम से रहते थे। वर्ष 1999 में मां का निधन हो गया। इसके बाद वर्ष 2003 में मेरी सास रामजानकी गुप्ता नहीं रही। वर्ष 2008 में ससुर राधेश्याम गुप्ता सरपंच जी का स्वर्गवास हो गया। अब उन चारों प्राणियों में सिर्फ उनके पिता सेवानिवृत जेलर एसके सिंह (80) हैं जिनकी वे लोग सेवा कर रहे हैं। सेवानिवृत जेलर एसके सिंह का कहना है कि ऐसा अच्छा दामाद व बिटिया भाग्यवानों को ही मिलती है। वे हमारी छोटी छोटी बातों का भी ध्यान रखते हैं। ऐसा दामाद व बिटिया पाकर जीवन धन्य हो गया है।
इसी तरह का नगर के मुहल्ला पटेल नगर में एक कुलश्रेष्ठ परिवार रहता है जिनके पुत्र, बहुएं अपने मां-बाप व सास ससुर के आदेशों को ईश्वर की आज्ञा मानकर पूरा करते हैं। शिव प्रसाद कुलश्रेष्ठ (अब स्वर्गीय) सेवानिवृत प्रिंसिपल रहे। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती जमुनादेवी कुलश्रेष्ठ अब 80 वर्ष की है। उनके चार पुत्र व दो पुत्रियां क्रमश: राजेंद्र कुलश्रेष्ठ एडवोकेट, सुरेंद्र कुलश्रेष्ठ प्रधानाचार्य, देवेंद्र कुलश्रेष्ठ शिक्षक तथा लोकेंद्र कुलश्रेष्ठ गुड़गांव (हरियाणा) के इंजीनियर व दो पुत्रियां माया व छाया हैं। चार बहुएं हैं तथा पांच पौत्रियां, चार नाती हैं। श्रीमती जमुनादेवी बताती हैं कि पूरा परिवार एक बड़े मकान में एक साथ रहता है। हमारे परिवार में पिता व मां की बात को आदर्श वाक्य की तरह माना जाता रहा है। आज मेरी बात को वैसे ही मानते हैं। आज के जमाने में यह दुर्लभ है। मुझे चार हजार रुपए पेंशन मिलती है। लेकिन मै बेटे बहुओं से कुछ नही लेती मै स्वयं ही पौत्र पौत्रियों, नातियों को कुछ करती रहती हूं। सभी मेरा ख्याल रखते हैं।

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