संवर सकती है गन्ना किसानों की तकदीर

Jalaun Updated Tue, 28 Aug 2012 12:00 PM IST
माधौगढ़ (जालौन)। तहसील क्षेत्र में बेहतर गन्ना उत्पादन के बाद भी यहां के गन्ना किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। क्षेत्रीय किसानों का कहना है कि कृषि योग्य भूमि के ज्यादातर हिस्से पर गन्ना बोने के बाद भी यहां सरकारी कांटा व शुगर मिल न होने से उन्हें उत्पादन का बेहतर मूल्य नहीं मिल पाता है।
जरूरतों को देखते हुए वर्ष 1974-75 में 18 लाख रुपए की लागत से डिकौली-माधौगढ़ पर शासन की ओर से बुंदेलखंड मिनी शुगर मिल की स्थापना की गई थी। तब मिल में 25 कुंतल शक्कर का रोजाना उत्पादन होता था। परंतु किसानों को समय से भुगतान न होने, मशीनों के रखरखाव में कमी के चलते ही मिल बंद हो गई। सुगर मिल में कांटा चितौरा में लगाया गया परंतु बसपा सरकार द्वारा मिल बेच दने से कांटा बंद कर दिया गया। मिल के तत्कालीन हेड मैकेनिक सत्यनारायण शर्मा ने बताया कि उस समय 300 रुपए मासिक वेतन मिलता था। पूरे वर्ष कार्य होता था। क्षेत्र में गन्ना की इतनी पैदावार थी कि मिल को गन्ना की कमी नहीं आई। उन्होंने बताया कि तब से अब तक गन्ना की पैदावार तीन गुनी हो गई है। उत्पादन को देखते हुए क्षेत्र में तीन शुगर मिल के लिए पूरा कच्चा माल उपलब्ध है।
किसानों का कहना है कि क्षेत्र में कुल मिलाकर 18 केसर मालिक हैं। केशर मालिक गन्ना का सरकारी मूल्य 390 रुपए प्रति कुंतल होने के बावजूद गन्ना 100 से 150 रुपए प्रति कुंतल अपने मर्जी के हिसाब से लेते हैं। साधन के अभाव, रुपए की जरूरत को लेकर गन्ना किसान कौड़ी के भाव में गन्ना केशर मालिकों को बेचने को मजबूर हैं। गन्ना किसानों का आरोप है कि क्षेत्र में सरकारी कांटा लगाए जाए साथ ही क्षेत्र में लगे छोटे छोटे केशरों पर अधिकारियों द्वारा कांटा की जांच हो और गन्ना का रेट अधिक से अधिक दिया जाए।
किसान कृष्णपाल सिंह, भूपेंद्र सिंह, दुर्गा प्रताप सिंह, इंद्रजीत सिंह आदि ने बताया कि एक बीघा गन्ना उत्पादन के लिए दो हजार रुपए बीज, डीएपी बोरी, 400 रुपए जुताई, 300 रुपए बावनी, 2100 रुपए गुड़ाई, 1600 रुपए सिंचाई, 2000 पिराई, 2 हजार मजदूरी सहित 11900रुपए की लागत आती है जबकि एक बीघा का उत्पादन 75 कुंतल होता है। सरकारी रेट 390 रुपए प्रति कुंतल से 29250 रुपया मिलता है। वहीं छोटे छोटे लगे केशरों पर बेचने के बाद 11250 रुपया मिलता है जो गुड़ रेट के हिसाब से कम ज्यादा करते हैं। किसानों का कहना है कि अगर प्राइवेट केशरों पर बेचने पर एक बीघा पर 650 रुपए ही मिल मिल पाता है जबकि सरकारी रेट पर बिकने पर एक बीघा में 18650 रुपए की बचत होगी। जिससे किसानों को फायदा होगा।

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