उपचार के इंतजार में है खस्ताहाल बसों का बेड़ा

Jalaun Updated Mon, 27 Aug 2012 12:00 PM IST
उरई (जालौन)। उरई रोडवेज बस के बेड़े में शामिल कुल 53 बसों में से 40 प्रतिशत बसें खस्ताहाल हैं। इनमें यात्री अपनी जान जोखिम में डालकर यात्रा करते हैं। हालत यह है कि बरसात में इन बसों की छत टपकती हैं। खिड़कियों के कांच टूटे हुए हैं। इससे यात्रियों को बरसात, जाड़ा, गर्मी में दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। तमाम बसों की आगे व पीछे की लाइटें खराब हैं। इससे दुर्घटनाएं भी होती रहती हैं। बसों के इंजन लंबे समय से बोर नहीं हुए हैं। इससे वे ज्यादा डीजल खाते हैं। कम एवरेज के कारण चालक परिचालक को डांट खानी पड़ती है। टायर का पंचर ठीक कराने को 80 रुपए मिलते हैं। इससे ज्यादा खर्च होने पर चालक परिचालक को अपनी जेब से भरना पड़ता है।
उरई रोडवेज के बेड़े में कुल 53 बसें शामिल हैं। इनमें उरई-दिल्ली, उरई-झांसी, उरई-कानपुर, उरई-राठ सहित विभिन्न रूटों की कुल 53 बसें हैं। इनमें लगभग 40 प्रतिशत बसे ऐसी हैं जिनकी बरसात में छतें टपकती हैं, तमाम बसों की खिड़कियों में कांच नहीं है। यदि हैं भी तो प्रत्येक खिड़की में दो की जगह एक एक कांच लगे हुए हैं। इन खस्ताहाल बसों के ट्यूब अक्सर पंचर होते रहते हैं। इससे यात्रियों को तो परेशानी होती ही है, चालक परिचालक भी परेशान होते हैं।
चालक परिचालक अरविंद उल्ला, संजय कुमार सचान, रमाकांत सचान, महेश गुप्ता, अवधेश प्रताप, उदय गोपाल, धर्मेंद्र सिंह, आजाद अली, अलोक, रमेश चंद्र, आरिफ आदि ने बताया कि विभाग ने टायर का पंचर सुधरवाने के लिए 80 रुपए निर्धारित कर रखा है। अब एक सौ पच्चीस रुपए में पंचर जोड़े जाते हैं। 80 रुपए के बाद जितना भी ज्यादा लगता है वह चालक परिचालक को अपनी जेब से देना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यात्रियों को अलग से परेशानी होती है।
उन्होंने बताया कि खस्ताहालत बसों की आगे और पीछे की लाइट भी खराब हैं जिससे कई बार वाहन दुर्घटनाएं भी रात में होती रहती हैं। उन्होंने कहा कि तमाम बसों के इंजन लंबी दूरी तय करने के लिए अभी तक बोर नहीं हुए। इससे बसें बीच रास्ते में खड़ी हो जाती है। पुराने इंजन की वजह से विभागीय मानक प्रतिलीटर साढ़े पांच किलोमीटर का ऐवरेज नहीं दे पाती हैं। इससे चालकों को उल्टी डांट खानी पड़ती है।
इस बाबत उरई डिपो कार्यशाला के फौरमैन एन के सुमन स्वीकार करते हैं कि तमाम बसे ऐसी हैं जो काफी खराब हैं। उनको सुधरवाने का प्रयास होता रहता है। टपकती छतों में एमसील आदि लगाया जाता है। चाहे रबरिंग टायर हो या अन्य समान जो स्टोर में उपलब्ध होता है दे दिया जाता है। बाकी जो अन्य सामान की जरूरत होती है उसके लिए आरएम झांसी को विभागीय पत्र लिखकर सूचित कर दिया जाता है।

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